08.30.06
पाठकों से आग्रह
आज हम खबरिया की पूरी टीम बहुत दु:खी है, हमने सोच विचार के बाद यह पोस्ट लिखने का निर्णय लिया है, आप सभी से निवेदन है कि इस पर ध्यान दें।
आज हम बहुत क्षुब्ध है, क्योंकि हमारे इस ब्लॉग की वजह से साथी हिन्दी ब्लॉगरो के बीच मे वैचारिक वैमनस्य फैल गया है। हमारा उद्देश्य कभी यह नही रहा। हमारे गुरुजी कहा करते थे, ऐसा लिखो कि लोगों के विचार उद्देलित हो, लेकिन कभी भी ऐसा मत लिखो कि दो विचारधाराओं या समुदायों मे टकराव की सम्भावना बने। हमारा काम प्रहरी का होना चाहिए, हमारा काम है समाचार देना ना कि अच्छे बुरे का निर्णय करना। निर्णय जनता को करने दो।
हमारे कुछ ब्लागर साथियों को हमारे “सबसे पहले हम मीडिया की लेंगे” वाली बात पर बुरा लगा था। यकीन मानिए, वो सिर्फ़ और सिर्फ़ एक टाइपोग्राफिक गलती थी। हमारा वाक्य था “सबसे पहले हम मीडिया की खबर लेंगे” लेकिन पब्लिश होते समय “खबर” गायब हो गया। अभी हम तकनीकी रुप से पारंगत नही है, इसलिए ये गलतिया होती है, अब उसे ठीक किया जा रहा है। हम भी भाषा की गरिमा बनाए रखने में विश्वास रखते हैं। हम आपको विश्वास दिलाते है कि हम कभी गन्दगी नही परोसेंगे। रही बात मीडिया हाउस वालों की, तो भैया जाके पाँव न फटी बिवाई, सो क्या जाने पीर परायी हम तो बस इतना ही कहेंगे कि भैया एक बार किसी मीडिया हाउस मे नौकरी करके देख लो, ईमानदारी की कोई कीमत नही है यहाँ। दिल के घाव हरे ना करते हुए, बस इतना ही कहना चाहेंगे कि हम जो लिख रहे है, शत प्रतिशत सही है। अब अगर हमारे पास सबूत होते तो हम यहाँ लिखने के लिये नही बचते मेरे भाई। हम जैसे ही सबूत दिखाते हुए आवाज उठाते, वैसे ही हम मिटा दिए जाते। जाने कितने चले गए, दिल मे अरमान लिए।
बस हमारा सिर्फ़ इतना कहना है कि हम इतने प्यार मोहब्बत से आपको सुना रहे, उसे पढिए ना, काहे पड़ोसी के साथ पिल रहे है। ( वो एक बुजुर्ग ब्लॉगर के शब्दों मे कहे तो काहे चिल्लम चिल्ली करते हो, कभी रामलीला नही देखी क्या?) । इसलिए अब पड़ोसी (साथी टिप्पणीकार) की तरफ़ प्यार भरी मुस्कराहट बाँटते हुए इन्तजार कीजिए, अगली पोस्ट का।
08.29.06
एनडीटीवी – दिल में सच और जुबां पर?
पिछली दफ़ा जब हमने आजतक की ख़बर ली थी तो दर्द किन्ही औरों को उठा था। हम जब नेताओं को गालियां देते हैं तो सभी तारीफ़ करते हैं। लेकिन जब लोकतंत्र के डगमगाते चौथे स्तंभ पर उंगलियां उठाते हैं तो आलोचना क्यों की जाती है? रहा सवाल अपनी पहचान ज़ाहिर करने का तो यही कहना चाहेंगे कि हमारी रोज़ी-रोटी का सवाल है बाबा। हम इतनी ही पगार पा रहे हैं कि ज़िंदगी की रोजमर्रा की ज़रूरतें पूरी कर लें। अब हम कोई लखपति पत्रकार तो नहीं जो आलीशान कोठियों में रहकर समाजवाद के नारे देता हो और ना ही इतने बड़े दलाल कि हमारी कलम में किसी नेता की दी हुई दारू बहती हो। जो दिखता है वही लिख मारते हैं। सविनय निवेदन है कि ब्लॉग तो विचार है, अगर उसपर भी आपको आपत्ति है तो मत पढो भई, लेकिन हमारी जुबान पर ताला लगाओगे तो ब्लोगस्पाट बन्द कराने वाली सरकार और आप में क्या फर्क रह जाएगा? हमें तो अपनी बात कहने की आदत है और यह जारी रहेगी। पिछली दफ़ा आपने देखा था कि कैसे आजतक को हमने बिनपेंदिया साबित किया था। उस लेख के बाद हमें अंतरंग मेल आए हैं जिनको सही वक्त आने पर पाठकों के सामने ज़ाहिर किया जाएगा। इस बार आप एनडीटीवी की सुनिए।
एनडीटीवी – दिल में सच, ज़ुबां में आधा सच। आजतक में जिन पुन्यात्मा प्रसून का ज़िक्र किया गया था वैसे लोगों का एनडीटीवी में जमावडा है। डॉक्टर प्रणव राय का नाम भारतीय ब्राडकास्ट मीडिया के पुरोधा मरहूम सुरेंद्र प्रताप सिंह के बाद आता है। द वर्ल्ड दिस वीक से अपना मीडिया हाउस शुरू करने वाले डॉक्टर साहब अपने यहां बंगाली बनाम बिहारी लड़ाई से अक्सर परेशान रहते हैं। एनडीटीवी को क्लास का चैनल कहा जाता है- यही सुनकर यह डॉक्टर साहब रेटिंग देखकर भी परेशान नहीं होते हैं। हाल ही में इन्होंने अपने यहां के कर्मचारियों को मेल करके बताया है कि टीआरपी रेटिंग पर ना जाओ लेकिन विश्वसनीयता बनाए रखो। वे कहते हैं- टीआरपी रेटिंग के चक्कर में पड़ोगे तो हाल इंडिया टीवी जैसा होगा जो साल में दो-तीन दिन का राजा बन जाता है। यानी दिल बहलाने को ग़ालिब ख्याल अच्छा है। डॉक्टर साहब का चैनल तीसरे-चौथी पायदान के लिए लड़ता रहता है। हिन्दी फ़िल्मों में जिन्हें समानांतर सिनेमा का शौकीन कहा जा सकता है उनके लिए यह चैनल क्लास चैनल है जिसे मनमोहन देसाई की पिक्चर की बजाय रितुपर्णो घोष का सिनेमा ज़्यादा पसंद आता है। भले ही जनता के मगज में घुसे या ना घुसे।
राजनीतिक अखाड़े की ख़बरों के शौकीनों के लिए इसे सेक्यूलर चैनल कहा जाए तो ग़लत नहीं होगा। पहले बीजेपी की भड़काउ हरकतों वाली खबर उछालो, फिर उस पर वामनेताओं के विचार टीवी पर दिखाओ और फिर अपनी संपादकीय घुसेड़ो। यदि चैनल को निष्पक्ष दिखाना भी पड़ जाए तो बीजेपी या वीएचपी के बीपी सिंघल या प्रकाश जावड़ेकर सरीखे ढीले नेताओं से पार्टी को बचाते दिखवाओ। हो गया मकसद हल। बीजेपी को गाली भी दे दी और उसका पक्ष (ढीला) दिखा दिया। यहां सेक्यूलरिज़्म के सबसे बड़े झंडाबरदार हैं ख़बरदार वाले विनोद दुआ। सुबह पीयो, शाम पीयो और रात में सारा ग़ुस्सा संघ परिवार पर निकालो । यही इनका मोटो है। विनोद दुआ का नाम विनोद दुआ ना होकर विनोद पिया रख दिया जाए तो कोई पत्रकार बन्धु असहमत नही होगा। दुआ का दुराग्रह उनके इस कार्यक्रम ख़बरदार की संपादकीय में दिखाई देता है। पुरुषोत्तम अग्रवाल, प्रभाष जोशी सरीखे दोस्तों को दुआ साहब अपने प्रोग्राम में बुलाकर आए दिन काम देते हैं। बीजेपी वाले भी इतने ढी़ठ हैं कि रुसवां हो-होकर भी यहां आना नहीं भूलते। देबांग का नाम लिए बिना तो क़िस्सा पूरा कैसे होगा? आखिर सारी ज़िम्मेदारी ले देकर इन्हीं के कन्धों पर ही तो आती है। चैनल को पिछड़ता देख डॉक्टर साहब इन्हें पिछवाड़े का रास्ता दिखाने ही वाले थे कि मन बदल गया और साहब ने इन्हें दोबारा ज़िम्मेदारी दे दी। पिछले दिनों ब्लॉगस्पॉट वाले टीवी पत्रकार ने वूमनाइज़र की बात उठाई थी। एनडीटीवी का मुक़ाबला कराने वाले इन्हीं शख्स पर जमकर लोग बरसे थे वहां।
पुण्य प्रसून भी कभी यहीं आए थे लेकिन एक गली मे दो कैसे रह सकते है की तर्ज पर वे पुरानी गली में निकल लिए। चैनल की लाइन-लैंथ में ज़रा भी डगमगाहट नहीं आई है। जब से शुरू किया था तभी से सोनिया जी का गुणगान करने में रमा हुआ है। एनडीए के दौरान भी इसे ही सबसे ज़्यादा फ़ायदा हुआ। निंदक नियरे राखिए की तर्ज पर अशोक रोड के ऑफ़िस में इनको स्पेशल कैबिन खोलने की अनुमति भी मिल गई। चैनलवालों को विजय त्रिवेदी को धन्यवाद देना चाहिए। जिनके और दीनानाथ मिश्र जी के सौजन्य से बीजेपी के अंदर की ख़बरे मिलती रहती है। स्पेशल कैबिन मिला सो अलग।
हिन्दी का इंडिया तो ठीक है लेकिन इंग्लिश वाले चैनल की चौबीस घंटे और सातों दिन हालत खराब हो गई है। वजह है राजदीप के अलग होने से चैनल में उदासी छा गई है। खुद तो गए लेकिन पूरी फौज संग ले गए। अब मांगे एंकर मिलते नहीं। स्टार एंकर बरखा दत्त मैनेजमेंट करती है, उनका मैनेजमेंट तो हमेशा से ही बढ़िया रहा है। बस एक चीज है, अगर बरखा अपने गुस्से पर काबू रखे तो अच्छी मैनेजर बनने के बाकी गुण है उसमे। एनडीटीवी कर्मियों मे इनके मैनेजमेन्ट की बहुत चर्चा रहती है और वे तरह तरह की खबरें बाजार मे भेजते रहते है, लेकिन हम उन गन्दी बातों की चर्चा यहाँ नही करेंगे। चैनलों में लड़कियां वैसे भी ख़राब नहीं होती। या तो अच्छी होती हैं या फिर बहुत अच्छी। इसलिए एनडीटीवी भी या तो आपको अच्छा लगता होगा या फिर बहुत अच्छा.. बुरे की गुंजाइश के लिए आगे पढ़ते रहिएगा। और कहिए दिल में सच और ज़ुबां में आधा सच !!
08.23.06
बिनपेंदिया आजतक
आजतक : एक संक्षिप्त परिचय
इंडिया टुडे ग्रुप के इस चैनल को बिनपेंदिया चैनल कहा जाए तो कोई बुरा नहीं मानेगा. सबसे तेज़ होने का दावा करने वाले इस चैनल की आजकल उतरी हुई है। इसे कड़ी चुनौती स्टार न्यूज़ और बुढ़ापे में जवान होने का दावा कर रहे ज़ी न्यूज़ से मिल रही है। चैनलों के बीच आग लगाऊ स्पर्धा की शुरूआत इसी चैनल ने की थी। बीजेपी के ज़माने में इसकी खूब चांदी हुई। सरकार की चापलूसी करने में माहिर और अपने को चैनल के मालिक समझ बैठे दांत निपोर वक्ता प्रभु चावला छह साल तक एनडीए से राज्यसभा पहुंचाने की उम्मीद लगाए ही बैठे रह गए. सरकार बदली तो राग भी बदल गया। चैनल का भी और स्टार एंकरों का भी। आडवाणी के कहने पर दूरदर्शन को भगवा बनाने गए दीपक चरसिया लौट के बुद्धू आजतक को आए।
यहां एक वामपंथी भी हैं, इनका नाम है पुण्य प्रसून। व्यापार और विचारधारा के बीच संतुलन बिठाने के चक्कर में जुटे प्रसून जी को मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के पूंजीवादी प्रकोष्ठ का प्रवक्ता कहा जाए तो वे बुरा नहीं मानेंगे। मानेंगे भी काहे? यही काम तो करते रहे है अब तक, आप भी झेलिए आज तक। आजतक के अलावा दिल्ली में लोकल चैनल थोड़े दिन पहले ही लॉच किया गया है। यहां घर की खेती को झोंक दिया गया है। फ़ाइव स्टार कल्चर के मास कम्युनिकेशन कोर्स पूरा कर चुके नए-नवेले रिपोर्टर्स यहां कभी-कभार झुग्गी-बस्तियों के दर्द को भी बयान करते देखे जा सकते हैं। रईसों के बच्चे दो-ढाई लाख की फ़ीस टीवी टुडे नेटवर्क को देकर अपने पत्रकार होने का सर्टिफ़िकेट यहीं से पा जाते हैं।
एनडीए की सरकार जाने के बाद कॉग्रेसियों की निगाहें इस चैनल पर टिकीं थी। सत्ता बदलते ही मालिक अरुण पुरी ने सोनिया जी के दरबार मे हाज़री लगानी शुरु कर दी थी। इंडिया टुडे ग्रुप की सालाना कॉन्क्लेव मे सरदार मनमोहन सिंह को बुलाकर सरकार के सामने पलके बिछानें का संदेश दिया। एनडीए के दौरान बीजेपी को भोग लगाकर ख़बरों की शुरूआत करने वाले चैनल ने यूपीए सरकार के आते ही बीजेपी के नेताओं को चुन-चुनकर आइना दिखाना शुरू कर दिया। सात सफ़दरजंग की मलाई खाने वाले चैनल के कुछ एंकरों को बीजेपी के चाल-चरित्र-चेहरे मे अचानक सैकड़ो बुराइयां नज़र आने लगीं। विवादों को हवा देना हो या तूल देना, कोई कसर नहीं छोड़ी गयी। बड़ी शरम आती होगी अब तो इन्हें कि यूपीए का डंडा देखकर कैसे एनडीए की रसमलाई का स्वाद भूल गए। सरकार में कोई सूंघता नहीं और बीजेपी वाले इनकी एहसानफ़रामोशी से ग़ुस्साए बैठे हैं। फ़िलहाल आजतक की स्टार न्यूज़ और ज़ी न्यूज़ से ढीली हो रही है। चैनल के करिया मुंडा आशुतोष और सुमीत के राजदीप शरणम गच्छामी होने से यहां स्टार एंकरों के पसीने छूट रहे हैं। हेडलाइंस टुडे के बारे मे क्या कहे ये ख़बरिया। बस इतना समझ लो कि हिन्दी की ख़बरों को अंग्रेज़ी में अनुवाद करने वाला गिरोह यहां बैठा है जिसने अंग्रेज़ी चैनलों के मैदान में कूदने से पहले ही हथियार डाल दिए थे। यह निजी कंपनी का सरकारी चैनल कहा जा सकता है जहां आराम की भरपूर गुंजाइश बनी रहती है।
अभी तो केवल शुरुवात है, हमने सिर्फ़ आपका परिचय कराया है आजतक से। आगे और मसाला मिलेगा पढने को।
विनम्र निवेदन: साथियों अच्छी खबरों के लिए इन्तजार तो करना ही पड़ता है। खबरिया की टीम ( हम कई लोग है) अलग अलग मीडिया हाउस मे काम करती है। वहाँ पर ब्लॉगिंग बन्द है, इसलिए हमे इन्टर्नैट कैफ़े से करना पड़ता है। इसमे समय तो लगता ही है। उम्मीद है आप लोग इसका बुरा नही मानेंगे और यूँ ही खबरिया को प्रोत्साहित करते रहेंगे। यदि आपको भी किसी खबर पर नजर रखनी हो तो टिप्पणी मे जरुर लिखिएगा। जल्द ही हम आपके मीडिया सवालों के लिए ‘सवाल जवाब’ का कार्यक्रम भी शुरु करेंगे।
अंतरिक्ष से खबरिया, आज तक। इन्तजार कीजिए, अगली पोस्ट तक।
08.17.06
आ गया खबरिया
साथियों,
हम लेकर आएंगे आपके लिए एक से बढकर एक खबरें।
झन्नाटे दार, मसाले दार, लेकिन सच्ची सच्ची। वो खबरे, जिनकी चर्चा लोग दबी छिपी जुबान से करते है। लेकिन खुल कर कहने से डरते है। अभी तो हम सिर्फ़ मीडिया वालो की ख़बर लेंगे?
मीडिया वालो : हो जाओ तैयार, सुनने के लिये अपने अपने आफिस के अन्दर की बात। हमारे खबरिया हर मीडिया हाउस मे है। इसलिए हमारी खबर ‘अन्दर तक जाए, आराम का अहसास कराए’ है।