08.23.06

बिनपेंदिया आजतक

Posted in आज तक at 9:39 am by khabariya

आजतक : एक संक्षिप्त परिचय

इंडिया टुडे ग्रुप के इस चैनल को बिनपेंदिया चैनल कहा जाए तो कोई बुरा नहीं मानेगा. सबसे तेज़ होने का दावा करने वाले इस चैनल की आजकल उतरी हुई है। इसे कड़ी चुनौती स्टार न्यूज़ और बुढ़ापे में जवान होने का दावा कर रहे ज़ी न्यूज़ से मिल रही है। चैनलों के बीच आग लगाऊ स्पर्धा की शुरूआत इसी चैनल ने की थी। बीजेपी के ज़माने में इसकी खूब चांदी हुई। सरकार की चापलूसी करने में माहिर और अपने को चैनल के मालिक समझ बैठे दांत निपोर वक्ता प्रभु चावला छह साल तक एनडीए से राज्यसभा पहुंचाने की उम्मीद लगाए ही बैठे रह गए. सरकार बदली तो राग भी बदल गया। चैनल का भी और स्टार एंकरों का भी। आडवाणी के कहने पर दूरदर्शन को भगवा बनाने गए दीपक चरसिया लौट के बुद्धू आजतक को आए।

aajtakयहां एक वामपंथी भी हैं, इनका नाम है पुण्य प्रसून। व्यापार और विचारधारा के बीच संतुलन बिठाने के चक्कर में जुटे प्रसून जी को मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के पूंजीवादी प्रकोष्ठ का प्रवक्ता कहा जाए तो वे बुरा नहीं मानेंगे। मानेंगे भी काहे? यही काम तो करते रहे है अब तक, आप भी झेलिए आज तक। आजतक के अलावा दिल्ली में लोकल चैनल थोड़े दिन पहले ही लॉच किया गया है। यहां घर की खेती को झोंक दिया गया है। फ़ाइव स्टार कल्चर के मास कम्युनिकेशन कोर्स पूरा कर चुके नए-नवेले रिपोर्टर्स यहां कभी-कभार झुग्गी-बस्तियों के दर्द को भी बयान करते देखे जा सकते हैं। रईसों के बच्चे दो-ढाई लाख की फ़ीस टीवी टुडे नेटवर्क को देकर अपने पत्रकार होने का सर्टिफ़िकेट यहीं से पा जाते हैं।

एनडीए की सरकार जाने के बाद कॉग्रेसियों की निगाहें इस चैनल पर टिकीं थी। सत्ता बदलते ही मालिक अरुण पुरी ने सोनिया जी के दरबार मे हाज़री लगानी शुरु कर दी थी। इंडिया टुडे ग्रुप की सालाना कॉन्क्लेव मे सरदार मनमोहन सिंह को बुलाकर सरकार के सामने पलके बिछानें का संदेश दिया। एनडीए के दौरान बीजेपी को भोग लगाकर ख़बरों की शुरूआत करने वाले चैनल ने यूपीए सरकार के आते ही बीजेपी के नेताओं को चुन-चुनकर आइना दिखाना शुरू कर दिया। सात सफ़दरजंग की मलाई खाने वाले चैनल के कुछ एंकरों को बीजेपी के चाल-चरित्र-चेहरे मे अचानक सैकड़ो बुराइयां नज़र आने लगीं। विवादों को हवा देना हो या तूल देना, कोई कसर नहीं छोड़ी गयी। बड़ी शरम आती होगी अब तो इन्हें कि यूपीए का डंडा देखकर कैसे एनडीए की रसमलाई का स्वाद भूल गए। सरकार में कोई सूंघता नहीं और बीजेपी वाले इनकी एहसानफ़रामोशी से ग़ुस्साए बैठे हैं। फ़िलहाल आजतक की स्टार न्यूज़ और ज़ी न्यूज़ से ढीली हो रही है। चैनल के करिया मुंडा आशुतोष और सुमीत के राजदीप शरणम गच्छामी होने से यहां स्टार एंकरों के पसीने छूट रहे हैं। हेडलाइंस टुडे के बारे मे क्या कहे ये ख़बरिया। बस इतना समझ लो कि हिन्दी की ख़बरों को अंग्रेज़ी में अनुवाद करने वाला गिरोह यहां बैठा है जिसने अंग्रेज़ी चैनलों के मैदान में कूदने से पहले ही हथियार डाल दिए थे। यह निजी कंपनी का सरकारी चैनल कहा जा सकता है जहां आराम की भरपूर गुंजाइश बनी रहती है।

अभी तो केवल शुरुवात है, हमने सिर्फ़ आपका परिचय कराया है आजतक से। आगे और मसाला मिलेगा पढने को।

विनम्र निवेदन: साथियों अच्छी खबरों के लिए इन्तजार तो करना ही पड़ता है। खबरिया की टीम ( हम कई लोग है) अलग अलग मीडिया हाउस मे काम करती है। वहाँ पर ब्लॉगिंग बन्द है, इसलिए हमे इन्टर्नैट कैफ़े से करना पड़ता है। इसमे समय तो लगता ही है। उम्मीद है आप लोग इसका बुरा नही मानेंगे और यूँ ही खबरिया को प्रोत्साहित करते रहेंगे। यदि आपको भी किसी खबर पर नजर रखनी हो तो टिप्पणी मे जरुर लिखिएगा। जल्द ही हम आपके मीडिया सवालों के लिए ‘सवाल जवाब’ का कार्यक्रम भी शुरु करेंगे।

अंतरिक्ष से खबरिया, आज तक। इन्तजार कीजिए, अगली पोस्ट तक।

19 Comments »

  1. सत्ता के गलियारों में काम करने वाले सरकारी अफसरों के लिए अंदर की ख़बरें जिस प्रकार एडवांस में व्हिस्पर्सइनदिकोरिडोर्स से मिल जाती हैं, हमें उम्मीद है कि मीडिया जगत की ऐसी ही अंदरुनी ख़बरें आप दिया करेंगे। जब एक मीडिया संस्थान से स्टार एंकर लोग दूसरे संस्थान में छलांग लगाते हैं और कभी-कभी लौटकर वापस आते हैं, तो उनको मिलने वाले नए पे-पैकेज की अंदरुनी ख़बरें आप कभी-कभार अपनी पोस्ट में दे सकें तो ….

  2. SHUAIB said,

    अच्छी टांग खींची आजतक वालों की और ये बिनपेंदिया ज़बरदस्त नाम है ;)

  3. अच्छी खबर ली आपने आजतक वालों की,
    वैसे, लोकतंत्र के पैरोकार मीडिया हाउस, अपने यहाँ ब्लोगिंग बन्द रखते हैं..आश्चर्य की बात है..

  4. जागृति said,

    स्वागत है जनाब.

  5. रवि said,

    बढ़िया खबर ली आपने!

  6. आशीष said,

    शुरूवात अच्छी है, देखते है कि जोश कब तक बरकरार रहता है !

  7. प्रभू जी सीधी बात में खुद ही बोलते हैं, मेहमान जब तक बोले ब्रेक लेलेते हैं। वैसे भी विज्ञापन दिखा दिखा कर पका देते हैं आज तक वाले।
    वैसे अंदर की खबरें कहां हैं, आपने हमारी उम्मीदें बहुत बढ़ा दी हैं, अब समीक्षत्मक लेख लिख रहे हैं।

  8. बहुत बढ़ियां, स्वागत है ऎसी खबरों के साथ.

  9. वाह वाह, मजा आ गया। बस चालू रहिये और सबकी खबर लीजिये बारी बारी से।

  10. स्वागत है। आगे इंतजार है।

  11. बढ़िया है! बस अपना ख्याल रखियेगा, कहीं जिस थाली में खा रहे हैं उसी में छेद करते हुये पकड़े न जायें ;)

  12. sur said,

    स्वागत है आपका. देवाशीष ने सही कहा पोल खोल के चक्कर में रोजी-रोटी पर न बन आए इसका ध्यान रखिएगा. अंदर की खबरों का इंतजार रहेगा…

  13. अतुल said,

    पिछले कुछ दिनों में हिंदी चिठ्ठाकारिता में विविध आयाम जुड़ रहे हैं। विशुद्ध साहित्यिक चिठ्ठो के अलावा तकनीकि और अन्य विषयों पर लिखने वाले लेखकों का आगाज हुआ है। सबसे ज्यादा आस जगाई थी पत्रकारों के प्रवेश ने। चाहे वे धोनी के अँदाज का राज खोलते शशि सिंह हों या फिर देश दुनिया जिसकी एक एक प्रविष्टी मानो समुद्र से चुन कर लाया मोती है, या फिर हाल में ब्लागिंग से जुड़े नीरज दीवान जिनकी तेल की धार वाकई काबिले तारीफ है।
    पर इसी क्रम में कई गुमनाम चेहरे भी जुड़ रहे हैं। इनमे से एक हैं खबरिया जिनका आगाज कुछ यो होता हैं कि “अभी तो हम सिर्फ़ मीडिया वालो की लेंगे?” और फिर धुलाई पर उतरे खबरिया महोदय . हम सब जानते हैं और इडीयट बाक्स पर देख देख कर समझ चुके हैं कि समाचार चैनल सब्जी बेचने वालो से भी गये गुजरे हो चुके हैं। दहेज और स्त्री उत्पीड़न के मुद्दे छोड़कर, राखी साँवत की क्लास के द्वारा श्लील और अश्लील चुँबन में भेद सिखाते, विस्मिल्लाह खान के रिश्तेदारों मे छिड़ी थुक्काफजीहत का सजीव प्रसारण करते इन छिछोरों से , मनोज को जलता दिखाते इन दानवों से कोई ज्यादा उम्मीद है भी नही।
    कोफ्त तब होती है जब गुमनाम नामों से कुछ मघईये, तथाकथित पोलखोलक पत्रकार की आत्मा बनने का दावा करते ब्लागजगत पर अवतरित होते हैं और परोसना शुरू कर देते हैं मीडिया या राजनीति के चँडूखाने मे पक रही सड़ी खिचड़ी। जैसे किसी के चेहरे से उसका चरित्र पता नही चलता वैसे ही चँद पोस्टो से किसी ब्लाग का चरित्रान्वेषण करना उचित नही होगा। पर फिर भी खिन्नता होती हैं बल्कि उससे भी बढ़कर निराशा होती है जब देखता हूँ कि ब्लागिंग जैसे सँपादक के डँडे से मुक्त , गुमनाम रहने की स्वतँत्रता देने वाला और सर्वव्यापी माध्यम का दुरुपयोग होते देखते हूँ। उससे भी ज्यादा निराशा होती है जब अन्य चिठ्ठाकारो को इस सबकि तारीफ करते देकता हूँ? क्या यूनिकोड में कोई “अभी तो हम सिर्फ़ मीडिया वालो की लेंगे?” इतना लिखना सीख लें तो उसे आठ दस कमेंट मिलने चाहिये जब्कि दुर्लभ खबर लाने वाले देश दुनिया और बेबाक खुलासे करने वाले नीरज दीवान को महज चार या पाँच कमेंट।

    मेरा मानना है कि जो पत्रकार बँधु ब्लागिंग से जुड़े है उन्हे एकसाथ दोहरी सुविधायें उपलब्ध हैं, वे अपने अपने समाचार चैनलों, अखबारो के जरिये देश और समाज की नब्ज पर सीधे हाथ रखे होते हैं। साथ ही ब्लागिंग के जरिये वे वह सब कुछ परोस सकते हैं जिन्हें कारपोरेट प्रतिबद्धतायें नहीं उजागर होने देती। वे इन्टरेट के सूचना भँडार और अपने चैनलों कि असीमित पहुँच का लाभ उठाकर मुद्दो को , समाचारों को तथ्यपरक ढँग से परोस सकते हैं , या फिर अगर वे खुद को बुद्धिजीवी मानते हैं तो स्वतँत्र कालम भी लिख सकते हैं। पर इन सबकी जगह जब अपने सहयोगियो और वरिष्ठ पत्रकारों की सरेआम छीछालेदर, ब्लागिंग में करते देखता हूँ जैसी कि अभी खबरिया चैनल पर देखी या फिर खास खबर परोसने वाले शेखचिल्ली साहब तो यही लगता है कि क्या इसकी जरूरत है हिंदी ब्लागिंग को। जो आप लोग सीधे अपने सहकर्मियों के मुँह पर नही कह सकते वह ब्लागिंग में करके कौन सा तीर मार रहे हैं?

    कुछ समय पहले जादूटोने ब्लाग का सशक्त विरोध करने वाले साथी बँधुओ से पूछता हूँ कि आपको मेरी राय से सरोकार हैं या फिर जब बीच चौराहे मीडिया घरानो की लुँगी खींचने वाले इन गुमनाम पत्रकारों पर अदालती कार्यवाही के नोटिस आयेगें तो क्या फिर से आप समर्थन करेंगे।

  14. khabariya said,

    आप सभी की हौसलाअफ़जाई के लिए शुक्रिया। कुछ साथियों ने कुछ सवाल किए है और शंकाए जतायी है शायद हम इस लेख द्वारा उन शंकाओ का निराकरण कर सकें।

    लोकतन्त्र मे आप हमारी सोच और कार्यपद्दति से असहमत होने की पूरी स्वतन्त्रता रखते है। आपके सुझाव और आलोचना हमारे लिए महत्वपूर्ण है और हमे और परिष्कृत होने मे मदद करेंगे।

  15. [...] ऐसा ही कुछ हमारे साथ भी हुआ जब हमने नये पैदा हुये खबरिया ब्लाग के स्वागत के लिये बंदनवार में एक ‘वेलकमिया पत्ता’ टांग दिया। स्वागत करके हम भूल गये। लेकिन कुछ दिन बाद जब दुबारा देखा ब्लाग तो अतुल की लंबी फटकारती टिप्पणी भी दिखी जो यह बता रही थी कि पत्नी को कुछ दिन के लिये भारत भेजने के बाद उनकी मनमाफिक बोलने की आजादी बहाल हो गयी है। [...]

  16. Tarun said,

    खबरिया लेगा सबकी खबर लेकिन खबरिया की खबर कौन लेगा, जब तक आगे की खबर आये या खबरिया प्रेम नगर की डगरिया चले तब तक देखते रहिये आजतक…..

  17. अगर जवाबदेही न देनी हो तो बहुत कुछ लिखा जा सकता है – सही और गलत दोनों । क्या फ़र्क पड़ता है ? कुछ भी तो दाव पर नही है ?

  18. अतुल जी और अनूप भाई द्वारा ख़बरिया की ऐसी ख़बर ले ली गई है कि उनके बेलाग परंतु अपरिपक्व अंदाज में आगे से संतुलन आ जाएगा। लेकिन इसके साथ ही उनका उत्साह बढ़ाने की भी जरूरत है। जो मीडिया सबकी ख़बर लेता है और सबकी ख़बर देता है, उसकी ख़बर लेने और देने वाला भी कोई होना चाहिए। हमारे प्रेस और मीडिया में भी भ्रष्टाचार, तानाशाही, सनक, शोषण और गंदी राजनीति की जड़ें बहुत मजबूत हो चुकी हैं, लेकिन ये बातें बाहर नहीं आ पातीं। कौन करे ऐसा? चिराग तले अंधेरा होता ही है। ऐसा लगता है कि ख़बरिया, ये चाहें जो भी हों, मीडिया तंत्र में ठीक से समायोजित नहीं हो पाए हैं, और चिट्ठाकारी के माध्यम से कुछ खरी-खरी सुनाना चाहते हों तो मुझे उनसे सहानुभूति ही है। देखते हैं कि कब तक चला पाते हैं यह सब! हाँ, इस बात से मैं भी सहमत हूँ कि उन्हें अपनी भाषा संयत रखनी चाहिए। जहाँ तक अनाम और अज्ञात रहकर लेखन करने की बात है तो मुझे इसमें आपत्ति की कोई बात नहीं दिखती। बहुत से चिट्ठाकार साथी लोग जानबूझकर अनाम रहकर कई बार ओझी और अमर्यादित भाषा में टिप्पणी करते हैं चिट्ठाकारों की प्रविष्टियों पर। बेचारा चिट्ठाकार अधिक से अधिक उसे हटा ही सकता है न, या फिर अनाम टिप्पणियों का विकल्प समाप्त कर दे सकता है। मुझे खुद भी अपने विचारों और सरोकारों के लिए कुछ स्थापित चिट्ठाकारों ने अपशब्द भी भेंट किए अपनी टिप्पणियों के रूप में, लेकिन मैंने उनसे कोई शिकायत नहीं की। दरअसल परवाह भी नहीं की उनकी। लेकिन मैं यह समझता हूँ कि हिन्दी चिट्ठाकारी वास्तव में हिन्दी और भारतीयता के एकसूत्र से दुनिया भर में फैले हिन्दी प्रेमियों को जोड़ रही है और हमारे बीच आत्मीयता बढ़ रही है तो हमें इसको सकारात्मक ढंग से आगे बढ़ाना चाहिए।

  19. mayank sachan said,

    अभी ख़बरिया में अतुल जी का ब्लॉग कमेंट देखा ख़बरिया के लिए जो भी आपने कहा उसको देख कर लगता है की
    आप व्यावसायिक प्रतिबद्धता को लेकर इतना डरे हुएँ है की अगर ख़बरिया कुछ लोगों को सच बोलने के लिए उकसा रहा है
    तो आप ये कह कर उनको डरा रहे हो की अरे भैया अंदर की बात मत करो नहीं तो अंजाम ठीक नहीं होगा…. और सच बात ये है की
    आप जैसे लोग ही पत्रकारिता जगत को सिर्फ़ नौकरी का मध्यम मान चुके है जैसे कॉरपोरेट जगत ख़बरिया चैनलो को सिर्फ़ उद्द्योग
    मानता है लेकिन भाई साहब कुछ काम दुनिया में पेट और प्रजनन से परे होते है उनमें से एक काम हैं की समाज की जनता को सच से अवगत
    करने का काम जिनका है वो सच भी बोलें..लेकिन शायद आप लोगों में वो आग कभी थी ही नहीं आप तो सिर्फ़ पेट और प्रजनन के लिए पैदा
    हुए हो और ऐसे ही इस दुनिया से रुख़्सत हो जाओगे … हमारा देश बड़ी विषमताओं का देश है यहाँ जिसको पत्रकार बनना चाहिए वो नौकरी कर रहा होता है और जिसको नौकरी करनी चाहिए वो पत्रकारिता कर
    रहा है…. ख़बरिया जी आप लगे रहेओ हो सका तो एक दिन ये ख़बरिया भी ख़बर बनेगा……………


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