08.29.06
एनडीटीवी – दिल में सच और जुबां पर?
पिछली दफ़ा जब हमने आजतक की ख़बर ली थी तो दर्द किन्ही औरों को उठा था। हम जब नेताओं को गालियां देते हैं तो सभी तारीफ़ करते हैं। लेकिन जब लोकतंत्र के डगमगाते चौथे स्तंभ पर उंगलियां उठाते हैं तो आलोचना क्यों की जाती है? रहा सवाल अपनी पहचान ज़ाहिर करने का तो यही कहना चाहेंगे कि हमारी रोज़ी-रोटी का सवाल है बाबा। हम इतनी ही पगार पा रहे हैं कि ज़िंदगी की रोजमर्रा की ज़रूरतें पूरी कर लें। अब हम कोई लखपति पत्रकार तो नहीं जो आलीशान कोठियों में रहकर समाजवाद के नारे देता हो और ना ही इतने बड़े दलाल कि हमारी कलम में किसी नेता की दी हुई दारू बहती हो। जो दिखता है वही लिख मारते हैं। सविनय निवेदन है कि ब्लॉग तो विचार है, अगर उसपर भी आपको आपत्ति है तो मत पढो भई, लेकिन हमारी जुबान पर ताला लगाओगे तो ब्लोगस्पाट बन्द कराने वाली सरकार और आप में क्या फर्क रह जाएगा? हमें तो अपनी बात कहने की आदत है और यह जारी रहेगी। पिछली दफ़ा आपने देखा था कि कैसे आजतक को हमने बिनपेंदिया साबित किया था। उस लेख के बाद हमें अंतरंग मेल आए हैं जिनको सही वक्त आने पर पाठकों के सामने ज़ाहिर किया जाएगा। इस बार आप एनडीटीवी की सुनिए।
एनडीटीवी – दिल में सच, ज़ुबां में आधा सच। आजतक में जिन पुन्यात्मा प्रसून का ज़िक्र किया गया था वैसे लोगों का एनडीटीवी में जमावडा है। डॉक्टर प्रणव राय का नाम भारतीय ब्राडकास्ट मीडिया के पुरोधा मरहूम सुरेंद्र प्रताप सिंह के बाद आता है। द वर्ल्ड दिस वीक से अपना मीडिया हाउस शुरू करने वाले डॉक्टर साहब अपने यहां बंगाली बनाम बिहारी लड़ाई से अक्सर परेशान रहते हैं। एनडीटीवी को क्लास का चैनल कहा जाता है- यही सुनकर यह डॉक्टर साहब रेटिंग देखकर भी परेशान नहीं होते हैं। हाल ही में इन्होंने अपने यहां के कर्मचारियों को मेल करके बताया है कि टीआरपी रेटिंग पर ना जाओ लेकिन विश्वसनीयता बनाए रखो। वे कहते हैं- टीआरपी रेटिंग के चक्कर में पड़ोगे तो हाल इंडिया टीवी जैसा होगा जो साल में दो-तीन दिन का राजा बन जाता है। यानी दिल बहलाने को ग़ालिब ख्याल अच्छा है। डॉक्टर साहब का चैनल तीसरे-चौथी पायदान के लिए लड़ता रहता है। हिन्दी फ़िल्मों में जिन्हें समानांतर सिनेमा का शौकीन कहा जा सकता है उनके लिए यह चैनल क्लास चैनल है जिसे मनमोहन देसाई की पिक्चर की बजाय रितुपर्णो घोष का सिनेमा ज़्यादा पसंद आता है। भले ही जनता के मगज में घुसे या ना घुसे।
राजनीतिक अखाड़े की ख़बरों के शौकीनों के लिए इसे सेक्यूलर चैनल कहा जाए तो ग़लत नहीं होगा। पहले बीजेपी की भड़काउ हरकतों वाली खबर उछालो, फिर उस पर वामनेताओं के विचार टीवी पर दिखाओ और फिर अपनी संपादकीय घुसेड़ो। यदि चैनल को निष्पक्ष दिखाना भी पड़ जाए तो बीजेपी या वीएचपी के बीपी सिंघल या प्रकाश जावड़ेकर सरीखे ढीले नेताओं से पार्टी को बचाते दिखवाओ। हो गया मकसद हल। बीजेपी को गाली भी दे दी और उसका पक्ष (ढीला) दिखा दिया। यहां सेक्यूलरिज़्म के सबसे बड़े झंडाबरदार हैं ख़बरदार वाले विनोद दुआ। सुबह पीयो, शाम पीयो और रात में सारा ग़ुस्सा संघ परिवार पर निकालो । यही इनका मोटो है। विनोद दुआ का नाम विनोद दुआ ना होकर विनोद पिया रख दिया जाए तो कोई पत्रकार बन्धु असहमत नही होगा। दुआ का दुराग्रह उनके इस कार्यक्रम ख़बरदार की संपादकीय में दिखाई देता है। पुरुषोत्तम अग्रवाल, प्रभाष जोशी सरीखे दोस्तों को दुआ साहब अपने प्रोग्राम में बुलाकर आए दिन काम देते हैं। बीजेपी वाले भी इतने ढी़ठ हैं कि रुसवां हो-होकर भी यहां आना नहीं भूलते। देबांग का नाम लिए बिना तो क़िस्सा पूरा कैसे होगा? आखिर सारी ज़िम्मेदारी ले देकर इन्हीं के कन्धों पर ही तो आती है। चैनल को पिछड़ता देख डॉक्टर साहब इन्हें पिछवाड़े का रास्ता दिखाने ही वाले थे कि मन बदल गया और साहब ने इन्हें दोबारा ज़िम्मेदारी दे दी। पिछले दिनों ब्लॉगस्पॉट वाले टीवी पत्रकार ने वूमनाइज़र की बात उठाई थी। एनडीटीवी का मुक़ाबला कराने वाले इन्हीं शख्स पर जमकर लोग बरसे थे वहां।
पुण्य प्रसून भी कभी यहीं आए थे लेकिन एक गली मे दो कैसे रह सकते है की तर्ज पर वे पुरानी गली में निकल लिए। चैनल की लाइन-लैंथ में ज़रा भी डगमगाहट नहीं आई है। जब से शुरू किया था तभी से सोनिया जी का गुणगान करने में रमा हुआ है। एनडीए के दौरान भी इसे ही सबसे ज़्यादा फ़ायदा हुआ। निंदक नियरे राखिए की तर्ज पर अशोक रोड के ऑफ़िस में इनको स्पेशल कैबिन खोलने की अनुमति भी मिल गई। चैनलवालों को विजय त्रिवेदी को धन्यवाद देना चाहिए। जिनके और दीनानाथ मिश्र जी के सौजन्य से बीजेपी के अंदर की ख़बरे मिलती रहती है। स्पेशल कैबिन मिला सो अलग।
हिन्दी का इंडिया तो ठीक है लेकिन इंग्लिश वाले चैनल की चौबीस घंटे और सातों दिन हालत खराब हो गई है। वजह है राजदीप के अलग होने से चैनल में उदासी छा गई है। खुद तो गए लेकिन पूरी फौज संग ले गए। अब मांगे एंकर मिलते नहीं। स्टार एंकर बरखा दत्त मैनेजमेंट करती है, उनका मैनेजमेंट तो हमेशा से ही बढ़िया रहा है। बस एक चीज है, अगर बरखा अपने गुस्से पर काबू रखे तो अच्छी मैनेजर बनने के बाकी गुण है उसमे। एनडीटीवी कर्मियों मे इनके मैनेजमेन्ट की बहुत चर्चा रहती है और वे तरह तरह की खबरें बाजार मे भेजते रहते है, लेकिन हम उन गन्दी बातों की चर्चा यहाँ नही करेंगे। चैनलों में लड़कियां वैसे भी ख़राब नहीं होती। या तो अच्छी होती हैं या फिर बहुत अच्छी। इसलिए एनडीटीवी भी या तो आपको अच्छा लगता होगा या फिर बहुत अच्छा.. बुरे की गुंजाइश के लिए आगे पढ़ते रहिएगा। और कहिए दिल में सच और ज़ुबां में आधा सच !!