08.30.06

पाठकों से आग्रह

Posted in सूचना at 5:57 am by khabariya

आज हम खबरिया की पूरी टीम बहुत दु:खी है, हमने सोच विचार के बाद यह पोस्ट लिखने का निर्णय लिया है, आप सभी से निवेदन है कि इस पर ध्यान दें।

आज हम बहुत क्षुब्ध है, क्योंकि हमारे इस ब्लॉग की वजह से साथी हिन्दी ब्लॉगरो के बीच मे वैचारिक वैमनस्य फैल गया है। हमारा उद्देश्य कभी यह नही रहा। हमारे गुरुजी कहा करते थे, ऐसा लिखो कि लोगों के विचार उद्देलित हो, लेकिन कभी भी ऐसा मत लिखो कि दो विचारधाराओं या समुदायों मे टकराव की सम्भावना बने। हमारा काम प्रहरी का होना चाहिए, हमारा काम है समाचार देना ना कि अच्छे बुरे का निर्णय करना। निर्णय जनता को करने दो।

हमारे कुछ ब्लागर साथियों को हमारे “सबसे पहले हम मीडिया की लेंगे” वाली बात पर बुरा लगा था। यकीन मानिए, वो सिर्फ़ और सिर्फ़ एक टाइपोग्राफिक गलती थी। हमारा वाक्य था “सबसे पहले हम मीडिया की खबर लेंगे” लेकिन पब्लिश होते समय “खबर” गायब हो गया। अभी हम तकनीकी रुप से पारंगत नही है, इसलिए ये गलतिया होती है, अब उसे ठीक किया जा रहा है। हम भी भाषा की गरिमा बनाए रखने में विश्वास रखते हैं। हम आपको विश्वास दिलाते है कि हम कभी गन्दगी नही परोसेंगे। रही बात मीडिया हाउस वालों की, तो भैया जाके पाँव न फटी बिवाई, सो क्या जाने पीर परायी हम तो बस इतना ही कहेंगे कि भैया एक बार किसी मीडिया हाउस मे नौकरी करके देख लो, ईमानदारी की कोई कीमत नही है यहाँ। दिल के घाव हरे ना करते हुए, बस इतना ही कहना चाहेंगे कि हम जो लिख रहे है, शत प्रतिशत सही है। अब अगर हमारे पास सबूत होते तो हम यहाँ लिखने के लिये नही बचते मेरे भाई। हम जैसे ही सबूत दिखाते हुए आवाज उठाते, वैसे ही हम मिटा दिए जाते। जाने कितने चले गए, दिल मे अरमान लिए।

बस हमारा सिर्फ़ इतना कहना है कि हम इतने प्यार मोहब्बत से आपको सुना रहे, उसे पढिए ना, काहे पड़ोसी के साथ पिल रहे है। ( वो एक बुजुर्ग ब्लॉगर के शब्दों मे कहे तो काहे चिल्लम चिल्ली करते हो, कभी रामलीला नही देखी क्या?) । इसलिए अब पड़ोसी (साथी टिप्पणीकार) की तरफ़ प्यार भरी मुस्कराहट बाँटते हुए इन्तजार कीजिए, अगली पोस्ट का।

12 Comments »

  1. eswami said,

    भाषा की गरिमा का ध्यान रखने के संकल्प से प्रसन्न हूं और पाठकों के आग्रह को मानने से प्रभावित भी.

    ये जानते और समझते हुए भी की आजकल की इलेक्ट्रानिक संचार माध्यमों से जुडी पत्रकारिता के स्तर कितने खराब हो चुके हैं और आप ऐसे भ्रष्ट तंत्र की पोल खोलना चाहते होंगे, ये कहना ही होगा की आप जब किसी भी टीवी चैनल का नाम लेकर उसके बारे में लिखते हैं तो वह कोई व्यक्तिगत आक्षेप नहीं एक तंत्र की शिकायत मानी जाती है. लेकिन आप जब किसी व्यक्ति विशेष के बारे में नकारात्मक लिखते हैं और उसकी असल जिंदगी की छवि को प्रभावित करते हैं तो वो उस व्यक्ति का मानहनन है जिसका प्रतिकार या शिकायत साईबर स्पेस के बाहर वो आपकी गुमनामी के चलते नही कर सकता. वो कहां जाएगा मानहानी का दावा ले कर?

    इस स्थिती से आपकी छवि एक भीरू आक्रमणकर्ता की बनती है और पाठक के मन में आपकी अविश्वसनीयता भी बनी रहती है. ये प्रयास किसी व्यक्तिगत खुन्नस के निकास की व्यवस्था के तौर पर भी देखा जा सकता है.

    पुनश्च: गंदगी ना परोसने के आश्वासन का धन्यवाद और आशा है आप इस पक्ष पर भी गौर करेंगे! इस विषय पर बस इतना ही.

  2. SHUAIB said,

    खबरिया साहबः
    अप वही लिखो जो आप लिखना चाहते हैं
    हमने भी अपनी जवानी मीडिया मे ही खपाई थी -अब देखना ये है के मीडिया मे आप कहां तक तजरुबा रखते हैं ;) :) आपके ताज़ा लेख का इनतेज़ार रहेगा

  3. anunad said,

    जाके पाँव न फटी बिवाई, सो क्या जाने पीर परायी।।

  4. हमने पहले भी आपका समर्थन किया था आज भी कर रहे हैं. भाषा संयत रही तो आप इस परिवार के अटूट हिस्सा बन जाएंगे. हमारी शुभकामनाएं.

  5. अतुल said,

    माननीय खबरिया जी

    चिठ्ठा चर्चा के सौजन्य से पता चला कि किन्ही परिहार ने हमें तमाचे भेजे दे कोरियर से जो आपने हम तक पहुँचने के पहले ही जब्त कर लिये ।

    खैर मैं कुछ स्पष्टीकरण देना आवश्यक समझूँगा।
    १. अनाम रहकर लिखना मैं गलत नही समझता। अगर ऐसा होता तो ईस्वामी, सृजनशिल्पी, सुर, रीडर्स कैफे और कई अन्य श्रेष्ठ लेखकों के ब्लाग पर विरोध दर्ज कर दिया होता। ब्लागिंग निजी विचारों को सार्वजनिक करने का माध्यम है, इसे अनाम रहकर करें या नाम से, कोई फर्क नही पड़ता।
    २. “सबसे पहले हम मीडिया की लेंगे” एक टाइपोग्राफिक गलती थी, मान लिया बात खत्म, पर इसे किया १७ अगस्त को और माना ३० अगस्त को। पूरे १३ दिन बाद!
    ३. इस टाइपोग्राफिक गलती से पहले आपने लिखा कि “जब हमने आजतक की ख़बर ली थी तो दर्द किन्ही औरों को उठा था। हम जब नेताओं को गालियां देते हैं तो सभी तारीफ़ करते हैं। लेकिन जब लोकतंत्र के डगमगाते चौथे स्तंभ पर उंगलियां उठाते हैं तो आलोचना क्यों की जाती है?” यह वाक्य दुबारा , तिबारा पढ़ लीजीये। नेता, अभिनेता और वे सभी हस्तियाँ जिनकी सार्वजनिक छवि है, उनके एक एक कदम पर मीडीया और जनता की नजर होती है। इन्हें जनता अपना नायक बनाती है, सर आँखो पर बिठाती है तो इनसे भी मर्यादापूर्ण आचरण की अपेक्षा होती है। वैसा न करने पर इनकी थुक्काफजीहत लाजिमी है। हाँ वह आलोचना भी मर्यादा के अँदर हो तो ठीक वरना पीतपत्रकारिता बन जाती है।
    ४. आपके ब्लाग का दावा है कि आप लोग पत्रकार है, मीडिया में रहकर, मीडिया के भ्रष्टाचार की पोल खोलना चाहते हैं। कुछ उदाहरण देता हूँ काल्पनिक हैं, गौर करियेः
    मान लीजिये, आजकल ओंकारा और कभी अलविदा न .. के विरोध का स्टंट मीडिया दिखा रहा है, जनता पक गई है, जानती है यह सब दिखावा है, आप जिस संस्थान में काम करते हैं वह अपनी व्यवसायिक प्रतिबद्धताओं के चलते एकपक्षीय सामचार देता है, आप लोग ब्लाग के जरिये वह खुलासा नही कर सकते क्या?
    मान लीजिये, आरक्षण पर धुँआधार बहस छिड़ी है पर जिस तरह का सच , जैसी उत्कृष्ट समीक्षा सृजनशिल्पी ने लिखी वैसा लिखने के लिये शायद समाजशास्त्र , राजनीतिशास्त्र का अध्ययन जरूरी होता है। यह विषय बीए , एमए में होते हैं और समाज , राजनीति की खबर लेने रखने वाले पत्रकार यह सब पढ़े होते हैं ऐसा मेरा भ्रम है। तो क्या आप की टीम में किसी ने यह सब नही पढ़ रखा ?
    जब देश का पूरा का पूरा भ्रष्ट मीडिया जैसा कि आप दावा करते हैं, राकी साँवत के चुबँन शास्त्र, बाला साहेब की कुर्सी और राहुल महाजन के हनीमून के ठिकाने का पता करने में जुटा है तो आप ऐसा क्यों किया जा रहा हैं और क्या दिखाना चाहिये उस पर रोशनी नही डाल सकते?

    दरअसल पूरे विवाद कि जड़ में मेरा भ्रम , मेरी अपेक्षा शामिल थी, जब मैने आपका यह दावा देखा कि आप लोग पत्रकार हैं तो मुझे लगा कि अब हमें वह पढ़ने को मिलेगा जो आम मीडिया राजनैतिक, व्यवसायिक प्रतिबद्धताओं के चलते दिखाना नही चाहता। पर आप लोगो का उद्देश्य था “to bring the dirty laundry of various publicly known journalist, out in public”. आपको लगता है कि इससे मीडिया में व्याप्त भ्रष्टाचार मिटेगा तो आपको शतः शतः शुभकामनाऐं। मैनें खामखाँ कुछ ज्यादा की उम्मीद लगाकर आप लोगो की आलोचना की और अनजानें में अनूप शुक्ला और ईस्वामी की फजीहत करवायी।

    मैं इस प्रकरण के लिये अनूप शुक्ला और ईस्वामी से क्षमायाचक हूँ ।

  6. आमीन।

  7. कुछ तो लोग कहेंगे लोगों का काम है कहना

  8. hsonline said,

    आप बहुत अच्छा काम कर रहे हैं। लगे रहिए।
    चैनलों ने पहले ही परेशान कर रखा है। भाषा की ऐसी तैसी की है। हर खबर को ताजा खबर बताया है। पत्रकारोचित गहन विचार विमर्श को विलुप्त विद्या बना दिया है। ऐसे चैनलों की सच्चाये बताना निश्चय ही साह्स का कार्य है। आपके प्रयास के लिये बधाई!
    मुझे आज तक की पूरी कहानी का इंतज़ार रहेगा

  9. hitendra said,

    आपका कार्य प्रशंसनीय है। मीडिया ने हद कर दी है हर जगह।
    लोगों की टिप्पणियाँ छोड़िये, आप तो बस लिखते जाइये।

  10. media pundit said,

    achcha laga…ki ab khabar lene walo ki bhi khabhar lene koi aa gaya hai

  11. Anil Sinha said,

    ‘हम तो बस इतना ही कहेंगे कि भैया एक बार किसी मीडिया हाउस मे नौकरी करके देख लो, ईमानदारी की कोई कीमत नही है यहाँ।’ बिल्‍कुल सही लिखा है। पिछले 25 सालों का अनुभव है मुझे – मीडिया के पुरोधाओं का निर्लज्‍ज आचरण देखता ही चला आ रहा हूं। जो आप कर रहे हैं वही मैं भी कर रहा हैं। यहां आकर भरोसा हुआ हूं कि मैं अकेला नहीं हूं।

  12. mayank sachan said,

    @अतुल
    आप शायद ख़बरिया के ब्लॉग और ख़बरिया चैनल की ज़िम्मेदारियों में भेद नहीं कर पा रहे है इस ब्लॉग का लेना देना
    ख़बरिया चैनल में काम करने वाले लोगों से है ना की ख़बरों से.. और क्या दिखाना चाहिए इसकी सामान्य समझ सब को है
    अगर ये बताने से आप जैसे लोग समझ गये होते तो ये ब्लॉग नहीं चलते….. अनूप जी आप को तकलीफ़ ब्लॉग से नहीं है
    तकलीफ़ तो ये है की पत्रकारिता जगत के दलित समाज की आवाज़ बाहर क्यों आ रही है क्योंकि इसमे कई सफेदपोश पत्रकारों
    के व्यावसायिक हित दाँव में लग सकते है कुछ तुच्छ किस्म के आला पत्रकारों की हरकतें जाग ज़ाहिर हो सकती है…तो भैया अगर ये ठीक रखना है
    तो अपने गिरेबान में झाँके ख़बरिया जैसा ब्लॉग चलना चाहिए क्योंकि हो सकता है की वक़्त आए और लोग डर से ही सही पर अपना आचार व्यवहार
    ठीक रखें……………


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