अगस्त 20, 2007
देहदर्शनाओं का जलवा
चित्र में यह तो दिख ही रहा है कि कितना तेज़ चैनल है ये आजतक। देहदर्शना बालाओं का जलवा चैनलों पर इस कदर हावी हो चुका है कि इसके लिए वे कुछ भी कर गुज़रने को तैयार हैं। खींसे निपोरने वाले और खुद ज्यादा औरों को कम बकबकाने का मौका देने वाले प्रभु चावला ने हाल ही में रामगोपाल वर्मा की आग निशा कोठारी से सीधी बात की। पिछली बार राखी सावंत से सीधी बात की थी। दोनों देहदर्शनाएं हैं और यौवन का उभार दिखाने को हरदम तैयार। खबरिया ने सुना है कि पिछली बार राखी सावंत के साथ सीधी बात को जो टीआरपी मिली उससे उत्साहित होकर दोबारा उन्हें बुलाया गया था। और दूसरी बार पहले से ज़्यादा बदनखोलू पोज़ में। खास हिदायत ये दी जाती है कि इन बालाओं के आते ही.. स्क्रीन पर तैरती खबरिया लाइन्स (टिकर) हटा दी जाती है। ‘लोगो’ ऊपर खिसक जाता है और सुपर्स नहीं चलता। ताकि यौवन की घाटियां दर्शकों को दिख सकें।



खबरिया को पता चला था कि आईबीएन-7 पर जब पहली बार राखी सावंत का इंटरव्यू दिखाया गया था तब राजदीप ने लताड़ा था.. यह कहकर कि यहीं सब दिखाने के लिए चैनल नहीं लिया है। अब आईबीएन-7 ठहरा बिका हुआ चैनल जो जागरण के लिए घाटे का सौदा बन चुका था। पत्रकारिता के ज़रिए क्रांति करने के मंसूबे लेकर कई नामी-गिरामी लोगों की टीम राजदीप ने बना दी मगर हिन्दी की बदकिस्मती कहो कि यहां भी बिजनेस नहीं चला। लेकिन जैसे ही देहदर्शनाएं दिखानी शुरू की, चैनल ने रफ्तार पकड़ ली। ग़ुस्सा आए या रोएं हम.. जब हिन्दी चैनल देहदर्शन कराते हैं तब उसी वक़्त इंग्लिश चैनल Indo-US nuclear deal पर चर्चा कर रहे होते हैं।
प्रिंट वाले कौन से दूध के धुले हैं। इंडिया टुडे ने 1990 में दक्षिण भारतीय सिनेमा की सेक्स बम शकीला पर कवर स्टोरी की थी। ये अपने पल्ले नहीं पड़ा कि हिन्दी के पाठकों को साउथ की यौवना से क्या लेना-देना है। पंजाब केसरी में सुंदरियों की बहार छायी होती है। खबरिया की नज़र टीवी के अलावा पत्रिकाओं पर भी होती है। हिन्दी दर्शक-पाठक यह देखकर शर्मिन्दा ना हों कि मानसिक स्तर पर कितना उथला समझा जाता है हिन्दी को। अब इसमें समझने की बात क्या है। जो है तो है… क्या औकात है हिन्दी पाठकों की? इसकी एक बानगी देखो.. एक ही तारीख़ में निकले आउटलुक के हिन्दी और इंग्लिश अंक.. ज़रा नज़र डालिए।


राखी के बाद इन दिनों दूसरी बाला शर्लिन चोपड़ा की डिमांड चैनलों पर बढ़ गई है। एक मज़ेदार वाक्या हुआ। आजतक मे दढ़ियल पुण्यप्रसून का सामना इन शर्लिन से हो गया। पुण्यप्रसून कुछ कह रहे थे और शर्लिन कुछ समझ रही थी। अब पुण्यप्रसून खुद नहीं जानते कि वे ”किस तर्ज पर”, ”जिस तर्ज पर” और ”उस तर्ज पर” क्या-क्या कहते रहते हैं। उनके सवाल किस तर्ज पर होंगे ये तर्ज वो ही जानते हैं। उनके पास तर्ज, दशा, मिजाज जैसे चार-पांच शब्द हैं, जिन्हें लेकर वे अपना सवाल बुनते हैं। शर्लिन को भला वे कहां से समझ आते।
sanjay bengani said,
अगस्त 20, 2007 at 12:39 अपराह्न
Ravindra Ranjan said,
अगस्त 20, 2007 at 1:00 अपराह्न
आपने इतना कुछ कह दिया कि कहने को कुछ रह ही नहीं गया। सच ही है बुरा हाल है खबरिया चैनलों का। बताते कम हैं दिखाते ज्यादा हैं। तुर्रा यह कि दर्शक यही देखना चाहते हैं।
tejas said,
अगस्त 20, 2007 at 6:26 अपराह्न
well, actually hindi dekhane valon ke paas bhasha na ho deh ki, par aankhe.n to hain….
Rohit Tripathi said,
अगस्त 21, 2007 at 10:57 पूर्वाह्न
AAj pahli baar aaya aapke blog par aur kasam se mann ki sari batein kah di aapne, bahut bahut acha likha hai aapne in bin pendi ke loto ke barein mein kasam se di jeet liya aapne likhte rahiye
prakruti said,
अगस्त 30, 2007 at 7:46 पूर्वाह्न
sach likha aapane. baat yeh hai ki sab kuchcha commercial ho gaya hai. Paise ke liye sab kar rahe hain. vah koyi bhi ho. bas itna sa jaroor hai ki koi kam koi jyada.