सितम्बर 18, 2007

ख़बरदार या झंडाबरदार

Posted in एनडीटीवी, टीवी चैनल वाले at 1:13 अपराह्न द्वारा khabariya

क्या कहे भई… पिछली बार जब विनोद दुआ का जिकर हुआ था तो लोगों को बुरा लगा कि ऐसी महान विभूति के लिए इस तरह के शब्दों का इस्तेमाल मानसिक दिवालियापन है। हम भी सोचे यार कि गलती हो गई। किसी दिन सामना हो गया तो हम ही झेंप जाएंगे कि ऐसा हमने क्यों किया। अब जो हुआ सो हुआ। हो सकता है कि ऊपरवाला ही हमरे मुंह से उनके लिए उल्टा-सीधा बुलवाना चाह रहा हो। जो होता है अच्छा होता है। हम मिलकर माफी मांग लेंगे। खामाखां बीच में कोई गुरू-घंटाली दिखाने की कुचेष्टा ना करे तो ही अच्छा। नौकरी थोड़ी छीन लेंगे। बड़े लोग छोटी बातों का बुरा नहीं माना करते।

अपनी खबर नहीं है इस बार.. इस बार दुआ साहब की एक बात लेकर हम आ गए हैं। हुआ यों कि कल विनोद दुआ जी ने खबरदार में कहा कि करुणानिधि के बयान पर बीजेपी वाले कुछ नहीं बोले। और इस पर पोल भी चला लिया। आपको तो पता है पोल का तीसरा विकल्प दुआ साहब के मन का होता है। जिसे प्रोग्राम के अंत में सबसे ज्यादा वोट मिल जाते हैं और हो जाता है फैसला राष्ट्रीय नाड़ी का। नाड़ी धड़क रही है दुआ साहब की नाड़ी के साथ.. कदमताल मिलाते हुए।

भई, हमने माना कि बीजेपी वाले निरा मूर्ख है। खुरापाती हैं। राम के नाम पर देश की धर्मनिरपेक्षता की लुटिया डुबाने का मंसूबा पाले हुए हैं लेकिन भैये खबरदार तैयार करते समय ये तो देख लिया करो कि पीटीआई यूएनआई आईएएनएस वगैरह वगैरह क्या कह रहे हैं। हुआ यह कि करुणानिधि ने बयान दिया.. कुछ लोग कहते हैं कि 17 लाख साल पहले एक व्यक्ति हुआ जिसका नाम राम था। उनके द्वारा निर्मित सेतु को नहीं छुएं, कौन हैं यह राम, किस इंजीनियरिंग कालेज से उन्होंने पढ़ाई की, क्या इसका कोई सबूत है? कुछ भेड़िए द्रविड़ आंदोलन को खत्म करना चाहते हैं।

कल जब अन्नादुरै की 99वे जन्मदिवस समारोह वाला यह बयान आया। उसके कुछ ही घंटों में बीजेपी की तरफ़ से बयान आ चुका था। प्रवक्ता रविशंकर प्रसाद और मुरली मनोहर के बयान रात तक पीटीआई पर भी आ चुके थे। अरे भई.. इतनी जल्दी क्या थी दुआ साहब को।
vinod dua
दुआ साहब ही क्या एनडीटीवी वालों की आदत है कि वे बीजेपी के साथ छुआछूत का व्यवहार करते रहते हैं। भई सीधा उसूल अपनाओ.. रिपोर्ट निष्पक्षता से लिखो… संपादकीय में अपना ज्ञान बखारो। यह संतुलन साधा करो- खबरिया छोटा मुंह बड़ी बात क्या कहे। मान भी लें कि उस वक्त बीजेपी का बयान नहीं आया था..तो भी फुनवा घुमा लेते और ले लेते बयान। कभी कभी तो लगता है कि ग़ैरबीजेपीवाद के झंडाबरदार बन जाते हैं खबरदार वाले। आदत सुधारो दद्दा इस कदर दुश्मनी ठीक नही लगती। या हमहुं साहिर का शेर मारे.. पीकर?

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सितम्बर 12, 2007

सहारा प्रणाम को नमस्ते

Posted in टीवी चैनल वाले at 4:22 अपराह्न द्वारा khabariya

ख़बर है कि ‘जिस तर्ज पर’, ‘उस तर्ज पर’ तर्जबंदी करने वाले दढ़ियल पुण्य प्रसून वाजपेयी जो कि अब तक ”आजतक” को अपनी सेवाएं दे रहे थे- ने चैनल को अलविदा कहते हुए राष्ट्रीय सहारा चैनल ज्वाइन किया है.. ये तो आपको पहले ही किसी न किसी ने बता दिया होगा। टीवी जनर्लिज़्म के एंकर-रिपोर्टर समेत तमाम कर्मचारी तराज़ू के मेढक होते हैं। कौन-कब-कहां ज्वाइन कर लेता है- ये वो खुद नहीं जानता। खुद बेचारों को बाद में भान होता है तो कहते हैं- ‘ये कहां फंस गए यार’। वैसे ये तो परमसत्य है कि चैनल वाले जितनी नौकरी छोड़ते हैं तनख्वाह में गुणात्मक बढ़ोतरी होती जाती है। यदि आप चैनल में नौकरी कर रहे हैं तो फ़ौरन स्वामीभक्ति छोड़ नोटभक्ति में रम जाइए, फिर ना कहना कि ख़बरिया ने बताया नहीं।

कुछ ही हफ्तों पहले पुण्य प्रसून त्रिवेणी चैनल ज्वाइन कर चुके थे। चार दिन में ही वहां के हेड रामकृपाल जी से मतभेद हो गए और पुण्य प्रसून बाजपेयी वापस ‘आजतक’ चले गए। विदित हो कि त्रिवेणी चैनल अभी लॉच नहीं हुआ है। आप कहोगे कि रामकृपाल जी और बाजपेयी जी के बीच लेफ्टिस्ट और राइटिस्ट वाला झगड़ा हुआ होगा। ना ना.. ऐसा अब थोड़ी होता है। कौन राइटिस्ट और कौन लेफ्टिस्ट अपने जॉब को लात मारेगा? उदारीकरण में झगड़े तो अब तेरी कार का मॉडल, मेरे मॉडल से नया कैसे-वाली तर्ज पर होता है भैये। नोट करो ”ज्ञान बांटने से बढ़ता है..” ये पहले की सूक्ति थी। अब कहा जाता है- ”औरों को ज्ञान बांटने से तनख्वाह कम हो जाती है”

रामकृपाल जी ने पत्रकारिता की शुरूआत कानपुर से 1971 में अपनी टूटी साइकिल पर शुरू की थी। आज त्रिवेणी चैनल की कृपा रामकृपाल जी पर बरस रही है सो वे चालीस लाख की कार में बैठकर रिपोर्टिंग कर रहे हैं। उधर, वाजपेयी जी हर महीने आठ लाख रुपए की तनख्वाह पर सहारा में गए हैं। सहारा श्री जिन दिनों दिल्ली प्रवास पर थे और वे चैनल के गिरते ग्राफ़ से परेशान हैं। राष्ट्रीय सहारा न्यूज़ चैनल दूरदर्शन के बाद ऐसा चैनल है जिसके पास सबसे ज़्यादा रिसोर्सेस हैं लेकिन सबसे आलसी प्राणी यहीं मिल जाएंगे। चैनल का इन मायनों में सरकारीकरण हो चुका है। सहारा श्री कुछ नयी नियुक्तियो के सिलसिले में दिल्ली आए हुए थे औऱ चैनल को टॉप टू बॉटम चकमक कर देने की चाह रखते हैं। संजय बरागटा ने भी सहारा ज्वाइन कर लिया है.

सहारा प्रणाम को नमस्ते करना होगाः पुण्य प्रसून ने आते सहारा ग्रुप की हेल हिटलर तर्ज वाली परंपरा – सहारा प्रणाम- को तिलांजली देने का फ़रमान जारी कर दिया है। कहा जा रहा है कि पूरा चैनल ही नए कलेवर में जब रंग जाएगा तभी पुण्य परदे पर दिखाई देंगे। छिंदवाड़ा, नागपुर के क़स्बाई इलाक़ो में अस्सी के दशक की पत्रकारिता करने वाले पुण्य अब दिल्ली के नामी पत्रकार हो गए हैं। चैनल वाले नामी एंकरों की तर्ज पर उन्हें सहारा में हर महीने सात लाख रुपया दिया जाएगा जो अब तक की सबसे बड़ी रकम मानी जा रही है।

एक और ख़बर – दिवंगत उदयन शर्मा के पुत्र कार्तिकेय शर्मा जो कि अब तक आजतक में न्यूज़ एंकर थे, ने बीएजी चैनल में छलांग लगा दी है। अजय सिंह जो स्टार न्यूज़ में नज़र आते थे ने भी सहारा चैनल ज्वाइन कर लिया है। सईद अंसारी स्टार से बीएजी आ गए हैं। ख़बर यह भी है कि आज तक की श्वेता सिंह जो हाल ही में चक दे इंडिया में दिखाई थीं, ने भी बीएजी में छलांग लगा दी है। नए रिपोर्टरों को आजतक के दफ़्तर का चक्कर रोज़ लगाते रहना चाहिए.. अच्छा अवसर है। बस इतना ध्यान रहे.. प्रतिभा नहीं पौवा लगाना पड़ेगा।

अगस्त 21, 2007

‘भूचुनौना’ का इंडिया टीवी

Posted in इन्डिया टीवी at 2:56 अपराह्न द्वारा khabariya

बदले भारत की तस्वीर यही घोषवाक्य है इंडिया टीवी का। चैनल भारत की तस्वीर नहीं बल्कि ख़बरिया चैनलों का ट्रेंड बदल चुका है। रजत शर्मा इस चैनल को 2004 के आम चुनाव के पहले यह सोचकर लाए थे कि देश को फ़ील गुड होगा, बीजेपी को फ़ील गुड होगा तो उनके चैनल को भी फ़ील गुड हो जाएगा। होम करते ही हाथ जले और चैनल खुलते ही मुसीबतों का पहाड़ टूट पड़ा। मेनका गांधी और तहलका के तरुण तेजपाल ने साथ छोड़ा। बीबीसी के सतीश जैकब भी कुछ ही दिनों में किनारे हो गए। तरुण ने वहा से अलग होकर साप्ताहिक ‘तहलका’ छापना शुरू किया। तरुण फर्जी तौर पर राहुल गांधी का इंटरव्यू छाप चुके हैं जिसके लिए उन्हें माफ़ी मांगनी पड़ी थी। तरुण के पेपर तहलका के सारे स्टिंग ऑपरेशन ग़ैरकॉग्रेसियों पर होते हैं। अब क्यों होते हैं- ये पूछने की दरकार है क्या? 

 इसके ठीक उलट इंडिया टीवी है। शुरू के कुछ महीनों तक चैनल नरेन्दर मोदी की आवाज़ माना जाता रहा। फिर चैनल ने पॉलीटिकल ख़बरो को किनारे कर दिया क्योंकि गुजरात के चुनावों में अभी टाइम है।

  चैनल लोगों की नज़रों में तब आया जब शक्ति कपूर पर स्टिंग ऑपरेशन किया। इसके बाद सेक्स स्कैंडल वगैरह भी जमकर दिखाए और चैनल खबरिया कम नौटंकी ज्यादा लगने लगा। अब इस चैनल को तांत्रिक टीवी पुकारा जाने लगा है। दरअसल, चैनल की टीआरपी को उठाने में शनिदेव और नागदेव का योगदान है।खबरिया को पता चला है कि चैनल में बाक़ायदा शनिदेव और नागदेव की पूजा की जाती है। हाल ही में नागपंचमी सभी कर्मियों ने धूमधाम से मनाया। इंडिया टीवी की टीआरपी उछाल ने पूरे ब्रॉडकास्ट मीडिया को भूचुनौना का नया फ़ॉर्म्यूला दिया है। आइए इसे समझते हैं-

भू- भूत-प्रेत

चु- चुड़ैल (एमएच-वन न्यूज़ चैनल के क्राइम शो की एंकर नहीं)

नौ- नौटंकी (घरेलू झगड़ों का ‘लाइव’ नेशनल समाधान)

ना- नागवंशियों के नृत्य  

इसके अलावा चैनल की मास्टरी सेक्स मसाले में भी है। राखी सावंत और शर्लिन चोपड़ा जैसी देहदर्शनाएं इसी चैनल की देन हैं। राखी को इंडिया टीवी का ब्रांड एम्बेस्डर माना जाता है। इसी तरह बाबा रामदेव का ग्राफ़ उठाने में भी चैनल का योगदान रहा है। रजत शर्मा को हिन्दी ख़बरिया चैनलों का पॉयोनियर माना जाता है। ज़ी टीवी पर उन्होंने ही शुरूआत की थी। अब ब्रॉडकास्ट मीडिया में नयी तिकड़में भी उन्हीं की इजाद हैं।

चैनल में काम कर रहे दर्ज़नभर रिपोर्टर लाइव इंडिया (जनमत) ज्वाइन कर चुके हैं। पूछे जाने पर खबरिया को बताया गया कि स्टूडियो में घूम रहे नाग-नागिनों की वजह से ऐसा हो रहा है। अब खबरिया यह पता लगाने में जुटा है कि ऐसे कौन से नाग-नागिन हैं जो रिपोर्टरों से ज़्यादा ज़हरीले हो चुके हैं, जिनके स्टिंग ने इनको आउट कर दिया। 

चैनल का फ़्लैगशिप शो ‘आपकी अदालत’ है। जिसके बारे में कहा जाता है कि यहां बड़े-बड़े से बड़ा अपराधी आए तो बाइज़्ज़त बरी कर दिया जाता है। संजू बाबा अगर यहां आ जाते तो बरी हो गए होते।

अगस्त 20, 2007

देहदर्शनाओं का जलवा

Posted in टीवी चैनल वाले at 10:41 पूर्वाह्न द्वारा khabariya

चित्र में यह तो दिख ही रहा है कि कितना तेज़ चैनल है ये आजतक। देहदर्शना बालाओं का जलवा चैनलों पर इस कदर हावी हो चुका है कि इसके लिए वे कुछ भी कर गुज़रने को तैयार हैं। खींसे निपोरने वाले और खुद ज्यादा औरों को कम बकबकाने का मौका देने वाले प्रभु चावला ने हाल ही में रामगोपाल वर्मा की आग निशा कोठारी से सीधी बात की। पिछली बार राखी सावंत से सीधी बात की थी। दोनों देहदर्शनाएं हैं और यौवन का उभार दिखाने को हरदम तैयार। खबरिया ने सुना है कि पिछली बार राखी सावंत के साथ सीधी बात को जो टीआरपी मिली उससे उत्साहित होकर दोबारा उन्हें बुलाया गया था। और दूसरी बार पहले से ज़्यादा बदनखोलू पोज़ में। खास हिदायत ये दी जाती है कि इन बालाओं के आते ही.. स्क्रीन पर तैरती खबरिया लाइन्स (टिकर) हटा दी जाती है। ‘लोगो’ ऊपर खिसक जाता है और सुपर्स नहीं चलता। ताकि यौवन की घाटियां दर्शकों को दिख सकें।

खबरिया को पता चला था कि आईबीएन-7 पर जब पहली बार राखी सावंत का इंटरव्यू दिखाया गया था तब राजदीप ने लताड़ा था.. यह कहकर कि यहीं सब दिखाने के लिए चैनल नहीं लिया है। अब आईबीएन-7 ठहरा बिका हुआ चैनल जो जागरण के लिए घाटे का सौदा बन चुका था। पत्रकारिता के ज़रिए क्रांति करने के मंसूबे लेकर कई नामी-गिरामी लोगों की टीम राजदीप ने बना दी मगर हिन्दी की बदकिस्मती कहो कि यहां भी बिजनेस नहीं चला। लेकिन जैसे ही देहदर्शनाएं दिखानी शुरू की, चैनल ने रफ्तार पकड़ ली। ग़ुस्सा आए या रोएं हम.. जब हिन्दी चैनल देहदर्शन कराते हैं तब उसी वक़्त इंग्लिश चैनल Indo-US nuclear deal पर चर्चा कर रहे होते हैं।

प्रिंट वाले कौन से दूध के धुले हैं। इंडिया टुडे ने 1990 में दक्षिण भारतीय सिनेमा की सेक्स बम शकीला पर कवर स्टोरी की थी। ये अपने पल्ले नहीं पड़ा कि हिन्दी के पाठकों को साउथ की यौवना से क्या लेना-देना है। पंजाब केसरी में सुंदरियों की बहार छायी होती है। खबरिया की नज़र टीवी के अलावा पत्रिकाओं पर भी होती है। हिन्दी दर्शक-पाठक यह देखकर शर्मिन्दा ना हों कि मानसिक स्तर पर कितना उथला समझा जाता है हिन्दी को। अब इसमें समझने की बात क्या है। जो है तो है… क्या औकात है हिन्दी पाठकों की? इसकी एक बानगी देखो.. एक ही तारीख़ में निकले आउटलुक के हिन्दी और इंग्लिश अंक.. ज़रा नज़र डालिए।


राखी के बाद इन दिनों दूसरी बाला शर्लिन चोपड़ा की डिमांड चैनलों पर बढ़ गई है। एक मज़ेदार वाक्या हुआ। आजतक मे दढ़ियल पुण्यप्रसून का सामना इन शर्लिन से हो गया। पुण्यप्रसून कुछ कह रहे थे और शर्लिन कुछ समझ रही थी। अब पुण्यप्रसून खुद नहीं जानते कि वे ”किस तर्ज पर”, ”जिस तर्ज पर” और ”उस तर्ज पर” क्या-क्या कहते रहते हैं। उनके सवाल किस तर्ज पर होंगे ये तर्ज वो ही जानते हैं। उनके पास तर्ज, दशा, मिजाज जैसे चार-पांच शब्द हैं, जिन्हें लेकर वे अपना सवाल बुनते हैं। शर्लिन को भला वे कहां से समझ आते।

अगस्त 15, 2007

लड़की से गई ‘दंबगई’

Posted in टीवी चैनल वाले at 4:51 अपराह्न द्वारा khabariya

ख़बरिया के हाथ ख़बर लगने में देर हो गई लेकिन जो तपास हुई उसके चलते ख़बर के अंदर की ख़बर हाथ लग गई। हुआ यूं है कि पिछले दिनों एक हिन्दी ख़बरिया चैनल से एक दिग्गज एंकर को निकाले जाने की ख़बर किसी ब्लॉगिए ने छाप दी। जल्दबाज़ी का चस्का ख़बरिया चैनलों का दिया हुआ है। ब्लॉगिओं की अघोषित लड़ाई भी चैनलों के साथ चल रही है लिहाज़ा अच्छाई-बुराई का आदान-प्रदान होता ही है। भैये.. ख़बर ब्लॉग पर इस तरह छपी कि एक चैनल के एक एंकर को वहां से हटा दिया गया। दरअसल, बाद में कन्फ़र्म हुआ कि उस एंकर की दंबगई गई यानी पर कतर दिए गए।

ख़बरिया से आप कहोगे कि ये तो पुरानी बात है.. नया क्या है तो भैये ख़बरिया को यह पता चला है कि मामला कास्टिंग काउच का था। दरअसल, इस शख़्स के वूमनाइज़र होने की बात हवा में कई महीनों से तैरती रही है। जब से कमान संभाली थी कई का भविष्य संवार दिया तो कुछ को किनारे कर दिया। ताज़ा घटना यूं थी कि चैनल के पितामह को एक लड़की की शिकायत आई कि ये शख़्स इन्हें भी ऑफ़र किए थे, अब परेशान कर रहे हैं। अब क्या था, पितामह एक तो वैसे ही गिरते चैनल ग्राफ़ से परेशान है। ऊपर से जिनके हाथों में कमान दे रखी है उनकी करतूतों ने बंटाधार कर रखा है। उठाया की-बोर्ड और धड़ल्ले से टकाटक लिखा कि अपना `मुक़ाबला` ख़ुद करो और बाक़िया औरों को खेलने दो। यह मेल संस्थान में सभी को भेजी गई थी।

पाठकों को शायद यह पता नहीं होगा कि पिछले दिनों `सबसे तेज़` होने का दावा करने वाले एक ख़बरिया चैनल के आउटपुट के तीसमार ख़ां को भी इसी वजह से संस्थान से निकाल बाहर किया गया था। ये तुर्रमखां अब आने वाले नए चैनल में ऊंची पोस्ट पर नियुक्त किए गए हैं।

  

चलते चलते

इंडिया टीवी छोड़कर जाने वाले रिपोर्टरों से कारण पूछे जाने पर पता चला है कि वे सभी नाग-नागिनों से परेशान थे। चैनल के स्टूडियो में नाग-नागिन ने बसेरा बना लिया है और सुबह से रात तक रिपोर्टरों को फुफकारते रहते थे। कुछ नाग तो रजत शर्मा के पास ही कुंडली मारकर बैठे हैं। कुछ चिपके है तो कुछ स्टार से आए हैं। ज़्यादातर रिपोर्टरों ने सुधीर चौधरी का लाइव इंडिया चैनल ज्वाइन कर लिया है। सुधीर चौधरी छह महीने पहले तक खुद इंडिया टीवी मे थे। सुधीर इन दिनों रजत शर्मा बनने की तर्ज पर समाचारों का लीड आउट (पुछल्ला, उपसंहार) देना नहीं भूलते।  

एक और ख़बर-

सोनिया गांधी जल्द ही दिल्ली से जयहिंद टीवी का लोकार्पण करने वाली है। दक्षिण भारत में राजनीतिक पार्टियों के कई चैनल है। जयहिंद टीवी कॉग्रेस का मलयाली चैनल होगा जो कम्युनिस्ट चैनल कैराली टीवी को टक्कर देगा। ख़बरिया सोच रहा है कि उत्तर भारत में ऐसा ट्रेंड कब आएगा जब पार्टियों के अपने चैनल हिन्दी मे होंगे। अब भी है..लेकिन खुले तौर पर पीठ पर ठप्पा लगवाने में शरम आती है।

पाठक ही बताएं कि कौन-सा चैनल किसके राग गाता है।

जुलाई 29, 2007

ख़बरिया आपकी खिदमत में

Posted in सूचना at 12:20 अपराह्न द्वारा khabariya

सबसे पहले सुधी पाठकों से माफ़ी.. मित्र और मित्राणियों, असम में लगी ड्यूटी की वजह से ये ख़बरिया दिल्ली की ख़बरों से दूर रहा। पिछले कई महीनों से हिन्दीभाषियों का विरोध और उल्फ़ा की कारगुज़ारियों का गवाह बना ये ख़बरिया… दिल्ली मीडिया में क्या कुछ घट रहा था ये सिर्फ़ फ़ोन और चैट के ज़रिए ही पता कर सकते थे। मेरे हिन्दी चिट्ठाकारों को मीडिया की ख़ास ख़बरें नहीं मिल सकी जिसका मुझे खेद है।

मीडिया-विमर्श और फोकटन गरियाने वाले लेख कुछेक लोग छाप रहे हैं पर वे सभी बौद्धिक बवासीर की कभी ना ख़त्म होने वाली खुजल ज़्यादा है। इसके उलट ख़बरिया मीडिया की असल और अंदर तक की ख़बर अपने पाठकों को देता है। आपको तो पता है कि ख़बरिया ख़बर देने के अलावा संकलन का काम भी करता है, इसलिए पिछले दिनों कुछ पाठकों और चैनलों- अख़बारों में काम करने वालों ने हमसे संपर्क भी किया है। आप भी  khabariya@gmail.com  पर अपनी ख़बर दे सकते हैं।

अब वापस ख़बरिया काम पर आया है। सभी पाठकों का सहयोग पूर्ववत रहेगा.. इसी उम्मीद के साथ आज क़लम को विराम देता हूं और जल्द से जल्द नयी पोस्ट आपके सामने पेश करूंगा। 

दिसम्बर 11, 2006

बुरा जो देखन मैं चला

Posted in इन्डिया टीवी, जी न्यूज, टीवी चैनल वाले at 11:25 पूर्वाह्न द्वारा khabariya

ये लो कल्लो बात!! हम सोच रहे थे कि इस हफ़्ते आप को अख़बार जगत की अंदरूनी ख़बरें बताएंगे लेकिन अख़बार वालों से ही चैनल वालों के बारे में कुछ ख़तरनाक टाइप का मामला पता चल गया। ख़बर पर तुरंत भरोसा हो गया क्योंकि चैनलवालों के अंदरखाने में ऐसी ख़बरें हमेशा तैरती रहती हैं। कोने-कोने में छिपे हैं केसानोवा. पॉवर, पैसा और पाप का सीधा नाता है। ख़बरिया किसी को नैतिकता का पाठ क्या पढ़ाए लेकिन जब मीडिया वाले दर्शकों के सामने भ्रष्ट नेताओं और बेइमानों को नैतिकता और ईमानदारी का पाठ पढ़ाते हैं तब वे भूल जाते हैं कि किसी के ऊपर उंगली उठाने के दौरान तीन उंगली उन पर भी उठती है।

याद कीजिये जब शक्ति कपूर को अपने स्टिंग ऑपरेशन में इंडिया टीवी ने बेआबरू किया था। जब अमन वर्मा को भी इसी कास्टिंग काउच के झमेले में फांसने की असफल कोशिश की गई थी। तब सारा देश बॉलीवुड के इस घिनौने सच से रूबरू हुआ था और गुमनामी के अंधेरे में डूबा इंडिया टीवी न्यूज़ चैनल एकाएक लाइमलाइट में आ गया। चैनल ने पूरी ताक़त झोंककर यह साबित करने की कोशिश की थी कि फ़िल्मी परदे पर चमकती रुपहली दुनिया का काला सच देखकर जनता को असलियत का अंदाज़ा हो जाएगा। लोगों पर पता नहीं कि क्या असर हुआ लेकिन जिसने देखा उसने मज़े लिए।

अब चैनल के एक रिपोर्टर पर बलात्कार का इल्ज़ाम लगा है। देश के तमाम अख़बारों ने इस ख़बर को प्रकाशित कर दिया है। लेकिन कुनबे की इज़्ज़त सरेआम नीलाम ना हो इसलिए चैनल का नाम दबा दिया। कोई नेता होता या आम आदमी होता तो आरोपी का तो छोड़िये उसके पूरे घर परिवार और दोस्त यारों को लपेटे में लेते। माइक मुंह में घुसेड़ घुसेड़कर बाइट के लिए उछलते-कूदते रहते।

ख़बरिया इन ख़बरों को छापने के लिए बदनाम है जो मीडिया वालों को पसंद नहीं आती। कोई अपनी गिरेबान में झांकता नहीं और आईना दिखा दो तो समझो सात जनम माफ़ न करने वाला गुनाह कर डाला हो।

एनडीटीवी और इंडिया टीवी में वूमेनाइज़र की ख़बरें पिछले दिनों टीवीपत्रकार ब्लॉगस्पॉट ने छापी तो उस बेचारे को लोगों ने टारगेट में डाल दिया। वो अपनी लंगोटी बचाकर जैसे-तैसे भागा। मीडिया में ये बीमारी अब जड़ तक फैल चुकी है। पहले बॉलीवुड इस कास्टिंग काउच के लिए बदनाम था। आज मीडिया में यह बुराई घर कर चुकी है। ख़बरिया को नैतिकता का पाठ किसी को पढ़ाना नहीं है लेकिन चैनल वाले दूसरों को लपेटे में ले लेकर नैतिकता का पाठ पढ़ाएं और सीना ठोककर ईमानदारी का प्रवचन हमको पिलाएं ये तो बर्दाश्त होने से रहा।

चलो अब ख़बर सुनो। थाने में दर्ज रिपोर्ट के अनुसार इंडिया टीवी के रिपोर्टर जगदीप सिंह ने ज़ी टीवी की एक रिपोर्टर शुभा (बदला हुआ नाम) का बलात्कार किया। रिपोर्टर शुभा ने थाने में रिपोर्ट दर्ज करायी और जगदीप सिंह को ग़िरफ़्तार कर लिया गया है। उसे रविवार रात चौदह दिन की न्यायिक हिरासत में तिहाड़ जेल भेज दिया गया है। कैसा ज़माना आ गया है, इंडिया टीवी का रिपोर्टर जगदीप सिंह तिहाड़ जेल ले जाया जा रहा है और सोमवार को इंडिया टीवी पर जिगोलो की स्टोरी का ऐलान किया जा रहा है। यहां भी नैतिकता का पाठ पढ़ाने की कोशिश!!

किसी ने कहा है कि बैलगाड़ी के नीचे चलने वाले कुत्ते को अकसर यह गुमान हो जाता है कि सारा बोझ उसी के कंधों पर है। चैनल वालों को भी यह गुमान हो गया है कि सारी ईमानदारी और नैतिकता का ठेका उन्हीं के कंधौं पर है। सच यह है कि हमाम में सब नंगे हैं। पढ़ लो और जाग जाओ दर्शकों।

“जब किसी को कोई गिला रखना… सामने अपने आईना रखना”

नवम्बर 17, 2006

अथ सुकेश-लालू गाथा

Posted in सीएनएन-आईबीएन at 12:34 अपराह्न द्वारा khabariya

 

लो दादा, ख़बरिया ताज़ा ख़बर लेकर फिर हाज़िर है। हमारे हरिराम नाई वीडियोकॉन टॉवर से लेकर फ़िल्मसिटी सब तरफ़ फैले हुए हैं। फ़िल्मसिटी के आख़िरी कोने में मौजूद बैरक नंबर आई बी एन सेवन के हरिराम ने आज सुबह ख़बर दी तो हम चौंक गए। हरिराम बता रहा था रामविलास पासवान की तो लग गई वॉट। ख़बर देखकर तो लगता है कि लोहा मंतरी पासवान को आने वाले दिनों में सचमुच में लोहे के चने चबाने पड़ेगे। यह चने उन्हें उनके राजनीतिक दुश्मन और पीएम बनने की लालसा ज़ाहिर कर चुके लालू प्रसाद यादव दे चुके हैं। आई बी एन पर सुबह से चल रहे समाचार के मुताबिक़ पासवान ने अपने राजनीतिक रसूख से बेटे को मोबाइल सेट दिलाया, मोबाइल बिल चुकाया, घर तक डीज़ल भी मंगवाया और निजी रखवालों का बिल भी स्टील अथॉरिटी ऑफ़ इंडिया को थमा दिया। उधर, सी एन एन-आई बी एन पर ख़बर चल रही थी और इधर लालू मन ही मन ख़ुश हो रहे थे। पासवान को पसीने छूट गए। लो हो गई फ़ज़ीहत लोहा मंतरी की। रंगे हाथ और किसे कहेंगे जब कि सेल वालों के हस्ताक्षर वाले दस्तावेज ख़बर में दिखाए जा रहे थे। आईबीएन का हफ़्तेभर के भीतर यह दूसरा पंगा है। इससे पहले मुलायम के सिपहसालार अमर सिंह से चैनल दुश्मनी ठान चुका है। अब आप बोलोगे कि डिटेल में बताओ।  

लो, डिटेल में ख़बर है कि एक दिन पहले ख़बरिया मुलायम सिंह की प्रेस कॉफ़्रेंस कवर करने दिल्ली के कई चैनलवालों के साथ गया था। मुलायम का इंतज़ार करते करते आधा घंटा हो गया। बड़ी देर बाद हलचल हुई तो पीछे देखा, अमर सिंह पधार रहे हैं। इससे पहले कि उन्होंनें माफ़ी मांगना शुरु किया आई बी एन वाला पिल पड़ा। आज तक का रोहित (पूरा नाम पता कर लो) भी नेतागिरी में उतर गया। देखते देखते दोनों अमर सिंह से भिड़ गए। अमर सिंह भी बमक गए और आईबीएन वाले को कहा माइक उठाकर ले जाओ। बड़े चैनल वाले तो कॉफ्रेंस का बायकॉट कर निकल गए लेकिन मजबूरी में सहारा वाला डटा रहा। इंडिया टीवी वाले को बॉस का फ़ोन आया कि ख़बरदार हटना मत, डटे रहो। बाकी़ छुटे-पिट्टे चैनलवालों के साथ प्रेस कॉफ़्रेंस शुरू हो गई।  

इधर, पासवान के बारे में समाचार आपने देखा होगा। ख़बरिया से पूछोगे कि इसमें एक्सक्लूज़िव कहां है। हरिराम ने क्या बताया? तो भैयू, ख़बर तो मिली ही लालू जी के सौजन्य से हैं। दरअसल, बात यह है कि आई बी एन का रिपोर्टर सुकेश रंजन बड़ा मुंहबोला है मियां लालू यादव का। लालू के (edited word) से दबा सुकेश गाहे-बगाहे लालू महिमागान में रमा रहता है। यह ख़बर और दस्तावेज लालू के कहने पर स्टील अथॉरिटी ऑफ़ इंडिया के एक बिहार कैडर के आई ए एस अफ़सर ने मुहैया कराए थे। ये दस्तावेज लालू के दिल्ली निवास पर ही सुकेश और उक्त अधिकारी के बीच सरकाए गए। चलो, इससे क्या? पासवान जी ने कोई ग़लती कर ही दी तो सज़ा भी होगी या नहीं? ये तो सोनिया जी बताएंगी। वैसे सोनिया जी भी इन दिनों लालू यादव से सजग हैं। जहां जहां आरजेडी घुस जाती है वहां से कॉग्रेस निपट जो रही है। इसलिए मैडम ने तो सोच ही लिया है कि आगे से लालू को कंधे पर हाथ रखने ही नहीं देना है। उधर, आई बी एन की रणनीति का खुलासा करते हुए हमारे हरिराम ने बताया है कि हिन्दी पट्टी के जो ग़ैर-कॉग्रेसी नेता सरकार में मंत्री बने हैं सिर्फ़ उन्हीं पर निशाना साधने का (edited word) कॉग्रेस अदा करेगी। बाक़ी किसी की ज़िम्मेदारी आई बी एन को नहीं सौंपी गई है।  दो महीने पहले लालू को निपटाने की मुहिम इंग्लिश चैनल ने शुरू की थी, इस बार पासवान पर पिल पड़े। सुना तो यह भी था कि नटवर को निपटाने के लिए सिब्बल डायरेक्टली आई बी एन के एडीटोरियल ग्रुप में (edited word) हो गए थे। तभई, सेवन रेसकोर्स पहुंचने के पहले पूरी रिपोर्ट राज –(edited) अंकल के पास एक मैडम लेकर आ जाती थीं। अब आप लोग मैडम का नाम पूछेंगे जो हम नारी गरिमा की शर्तों पर अटूट आस्था रखते हुए आपको नहीं बताने वाले। वैसे भी आप लोग हमेशा कुछ न कुछ पूछते ही रहते हैं, सौ झूठ हमसे बुलवाते हो मियां। हमऊं सब समझते हैं। जाओ मियां, अपना काम करो……

अगस्त 30, 2006

पाठकों से आग्रह

Posted in सूचना at 5:57 पूर्वाह्न द्वारा khabariya

आज हम खबरिया की पूरी टीम बहुत दु:खी है, हमने सोच विचार के बाद यह पोस्ट लिखने का निर्णय लिया है, आप सभी से निवेदन है कि इस पर ध्यान दें।

आज हम बहुत क्षुब्ध है, क्योंकि हमारे इस ब्लॉग की वजह से साथी हिन्दी ब्लॉगरो के बीच मे वैचारिक वैमनस्य फैल गया है। हमारा उद्देश्य कभी यह नही रहा। हमारे गुरुजी कहा करते थे, ऐसा लिखो कि लोगों के विचार उद्देलित हो, लेकिन कभी भी ऐसा मत लिखो कि दो विचारधाराओं या समुदायों मे टकराव की सम्भावना बने। हमारा काम प्रहरी का होना चाहिए, हमारा काम है समाचार देना ना कि अच्छे बुरे का निर्णय करना। निर्णय जनता को करने दो।

हमारे कुछ ब्लागर साथियों को हमारे “सबसे पहले हम मीडिया की लेंगे” वाली बात पर बुरा लगा था। यकीन मानिए, वो सिर्फ़ और सिर्फ़ एक टाइपोग्राफिक गलती थी। हमारा वाक्य था “सबसे पहले हम मीडिया की खबर लेंगे” लेकिन पब्लिश होते समय “खबर” गायब हो गया। अभी हम तकनीकी रुप से पारंगत नही है, इसलिए ये गलतिया होती है, अब उसे ठीक किया जा रहा है। हम भी भाषा की गरिमा बनाए रखने में विश्वास रखते हैं। हम आपको विश्वास दिलाते है कि हम कभी गन्दगी नही परोसेंगे। रही बात मीडिया हाउस वालों की, तो भैया जाके पाँव न फटी बिवाई, सो क्या जाने पीर परायी हम तो बस इतना ही कहेंगे कि भैया एक बार किसी मीडिया हाउस मे नौकरी करके देख लो, ईमानदारी की कोई कीमत नही है यहाँ। दिल के घाव हरे ना करते हुए, बस इतना ही कहना चाहेंगे कि हम जो लिख रहे है, शत प्रतिशत सही है। अब अगर हमारे पास सबूत होते तो हम यहाँ लिखने के लिये नही बचते मेरे भाई। हम जैसे ही सबूत दिखाते हुए आवाज उठाते, वैसे ही हम मिटा दिए जाते। जाने कितने चले गए, दिल मे अरमान लिए।

बस हमारा सिर्फ़ इतना कहना है कि हम इतने प्यार मोहब्बत से आपको सुना रहे, उसे पढिए ना, काहे पड़ोसी के साथ पिल रहे है। ( वो एक बुजुर्ग ब्लॉगर के शब्दों मे कहे तो काहे चिल्लम चिल्ली करते हो, कभी रामलीला नही देखी क्या?) । इसलिए अब पड़ोसी (साथी टिप्पणीकार) की तरफ़ प्यार भरी मुस्कराहट बाँटते हुए इन्तजार कीजिए, अगली पोस्ट का।

अगस्त 29, 2006

एनडीटीवी – दिल में सच और जुबां पर?

Posted in एनडीटीवी at 5:40 पूर्वाह्न द्वारा khabariya

पिछली दफ़ा जब हमने आजतक की ख़बर ली थी तो दर्द किन्ही औरों को उठा था। हम जब नेताओं को गालियां देते हैं तो सभी तारीफ़ करते हैं। लेकिन जब लोकतंत्र के डगमगाते चौथे स्तंभ पर उंगलियां उठाते हैं तो आलोचना क्यों की जाती है? रहा सवाल अपनी पहचान ज़ाहिर करने का तो यही कहना चाहेंगे कि हमारी रोज़ी-रोटी का सवाल है बाबा। हम इतनी ही पगार पा रहे हैं कि ज़िंदगी की रोजमर्रा की ज़रूरतें पूरी कर लें। अब हम कोई लखपति पत्रकार तो नहीं जो आलीशान कोठियों में रहकर समाजवाद के नारे देता हो और ना ही इतने बड़े दलाल कि हमारी कलम में किसी नेता की दी हुई दारू बहती हो। जो दिखता है वही लिख मारते हैं। सविनय निवेदन है कि ब्लॉग तो विचार है, अगर उसपर भी आपको आपत्ति है तो मत पढो भई, लेकिन हमारी जुबान पर ताला लगाओगे तो ब्लोगस्पाट बन्द कराने वाली सरकार और आप में क्या फर्क रह जाएगा? हमें तो अपनी बात कहने की आदत है और यह जारी रहेगी। पिछली दफ़ा आपने देखा था कि कैसे आजतक को हमने बिनपेंदिया साबित किया था। उस लेख के बाद हमें अंतरंग मेल आए हैं जिनको सही वक्त आने पर पाठकों के सामने ज़ाहिर किया जाएगा। इस बार आप एनडीटीवी की सुनिए।

ndtvएनडीटीवी – दिल में सच, ज़ुबां में आधा सच। आजतक में जिन पुन्यात्मा प्रसून का ज़िक्र किया गया था वैसे लोगों का एनडीटीवी में जमावडा है। डॉक्टर प्रणव राय का नाम भारतीय ब्राडकास्ट मीडिया के पुरोधा मरहूम सुरेंद्र प्रताप सिंह के बाद आता है। द वर्ल्ड दिस वीक से अपना मीडिया हाउस शुरू करने वाले डॉक्टर साहब अपने यहां बंगाली बनाम बिहारी लड़ाई से अक्सर परेशान रहते हैं। एनडीटीवी को क्लास का चैनल कहा जाता है- यही सुनकर यह डॉक्टर साहब रेटिंग देखकर भी परेशान नहीं होते हैं। हाल ही में इन्होंने अपने यहां के कर्मचारियों को मेल करके बताया है कि टीआरपी रेटिंग पर ना जाओ लेकिन विश्वसनीयता बनाए रखो। वे कहते हैं- टीआरपी रेटिंग के चक्कर में पड़ोगे तो हाल इंडिया टीवी जैसा होगा जो साल में दो-तीन दिन का राजा बन जाता है। यानी दिल बहलाने को ग़ालिब ख्याल अच्छा है। डॉक्टर साहब का चैनल तीसरे-चौथी पायदान के लिए लड़ता रहता है। हिन्दी फ़िल्मों में जिन्हें समानांतर सिनेमा का शौकीन कहा जा सकता है उनके लिए यह चैनल क्लास चैनल है जिसे मनमोहन देसाई की पिक्चर की बजाय रितुपर्णो घोष का सिनेमा ज़्यादा पसंद आता है। भले ही जनता के मगज में घुसे या ना घुसे।

राजनीतिक अखाड़े की ख़बरों के शौकीनों के लिए इसे सेक्यूलर चैनल कहा जाए तो ग़लत नहीं होगा। पहले बीजेपी की भड़काउ हरकतों वाली खबर उछालो, फिर उस पर वामनेताओं के विचार टीवी पर दिखाओ और फिर अपनी संपादकीय घुसेड़ो। यदि चैनल को निष्पक्ष दिखाना भी पड़ जाए तो बीजेपी या वीएचपी के बीपी सिंघल या प्रकाश जावड़ेकर सरीखे ढीले नेताओं से पार्टी को बचाते दिखवाओ। हो गया मकसद हल। बीजेपी को गाली भी दे दी और उसका पक्ष (ढीला) दिखा दिया। यहां सेक्यूलरिज़्म के सबसे बड़े झंडाबरदार हैं ख़बरदार वाले विनोद दुआ। सुबह पीयो, शाम पीयो और रात में सारा ग़ुस्सा संघ परिवार पर निकालो । यही इनका मोटो है। विनोद दुआ का नाम विनोद दुआ ना होकर विनोद पिया रख दिया जाए तो कोई पत्रकार बन्धु असहमत नही होगा। दुआ का दुराग्रह उनके इस कार्यक्रम ख़बरदार की संपादकीय में दिखाई देता है। पुरुषोत्तम अग्रवाल, प्रभाष जोशी सरीखे दोस्तों को दुआ साहब अपने प्रोग्राम में बुलाकर आए दिन काम देते हैं। बीजेपी वाले भी इतने ढी़ठ हैं कि रुसवां हो-होकर भी यहां आना नहीं भूलते। देबांग का नाम लिए बिना तो क़िस्सा पूरा कैसे होगा? आखिर सारी ज़िम्मेदारी ले देकर इन्हीं के कन्धों पर ही तो आती है। चैनल को पिछड़ता देख डॉक्टर साहब इन्हें पिछवाड़े का रास्ता दिखाने ही वाले थे कि मन बदल गया और साहब ने इन्हें दोबारा ज़िम्मेदारी दे दी। पिछले दिनों ब्लॉगस्पॉट वाले टीवी पत्रकार ने वूमनाइज़र की बात उठाई थी। एनडीटीवी का मुक़ाबला कराने वाले इन्हीं शख्स पर जमकर लोग बरसे थे वहां।

पुण्य प्रसून भी कभी यहीं आए थे लेकिन एक गली मे दो कैसे रह सकते है की तर्ज पर वे पुरानी गली में निकल लिए। चैनल की लाइन-लैंथ में ज़रा भी डगमगाहट नहीं आई है। जब से शुरू किया था तभी से सोनिया जी का गुणगान करने में रमा हुआ है। एनडीए के दौरान भी इसे ही सबसे ज़्यादा फ़ायदा हुआ। निंदक नियरे राखिए की तर्ज पर अशोक रोड के ऑफ़िस में इनको स्पेशल कैबिन खोलने की अनुमति भी मिल गई। चैनलवालों को विजय त्रिवेदी को धन्यवाद देना चाहिए। जिनके और दीनानाथ मिश्र जी के सौजन्य से बीजेपी के अंदर की ख़बरे मिलती रहती है। स्पेशल कैबिन मिला सो अलग।

हिन्दी का इंडिया तो ठीक है लेकिन इंग्लिश वाले चैनल की चौबीस घंटे और सातों दिन हालत खराब हो गई है। वजह है राजदीप के अलग होने से चैनल में उदासी छा गई है। खुद तो गए लेकिन पूरी फौज संग ले गए। अब मांगे एंकर मिलते नहीं। स्टार एंकर बरखा दत्त मैनेजमेंट करती है, उनका मैनेजमेंट तो हमेशा से ही बढ़िया रहा है। बस एक चीज है, अगर बरखा अपने गुस्से पर काबू रखे तो अच्छी मैनेजर बनने के बाकी गुण है उसमे। एनडीटीवी कर्मियों मे इनके मैनेजमेन्ट की बहुत चर्चा रहती है और वे तरह तरह की खबरें बाजार मे भेजते रहते है, लेकिन हम उन गन्दी बातों की चर्चा यहाँ नही करेंगे। चैनलों में लड़कियां वैसे भी ख़राब नहीं होती। या तो अच्छी होती हैं या फिर बहुत अच्छी। इसलिए एनडीटीवी भी या तो आपको अच्छा लगता होगा या फिर बहुत अच्छा.. बुरे की गुंजाइश के लिए आगे पढ़ते रहिएगा। और कहिए दिल में सच और ज़ुबां में आधा सच !!

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